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6 दिसंबर, 2019|2:24|IST

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आत्मसंघर्ष के लोचे

उसका ऐसा ही करार है। संघर्ष होगा तो आत्म संघर्ष होगा। बाहर आपाधापी है तो अंदर उसके लिए तैयारी का आत्मसंघर्ष भी चलता ही है। मुक्ितबेाध की तरह बीड़ी फूंककर और ‘अंधेरे में’ रहकर नहीं मरा जा सकता। वे सीधे पूंजीवाद से, साम्राज्यवाद से भिड़ गए। सब नारे आदि से दुश्मन को मारते थे। इन दिनों आत्मसंघर्ष का प्राकटय़ आसानी से नहीं होता ‘बिटविन द लाइन्स’ होता है। पांच साल बाद नई सरकारों की आहटें आने लगती हैं तब-तब लेखकों के बीच अनहद सी चुप्पी छा जाती है। वे राजनीतिक सामाजिक मसलों पर जल्दी दो टूक नहीं बोलते। बोलते हैं तो इतने ‘किंतु’ ‘परंतु’ लगाते हैं कि सबके ‘बंधु’ लगते रहें। प्रैक्िटस की बात है। हिन्दी वाला कर लेता है। बदलाव की आहटें उसके कानों में जल्दी पड़ती हैं। हिन्दी बेल्ट से ही बदलते हैं न सब! उसका काइयांपन बढ़ जाता है। आधुनिक युग का मूल्य आत्मसजगता ‘आत्मकाइयां’ हो चली है। चंट, चतुर, चालाक, मधुर, मितभाषी व मृदुभाषी गहरे आत्मसंघर्ष की पीड़ाओं से अपना उद्धार करता हुआ ताक में रहता है कि अगली सरकार किसकी? फिर साहित्य अपने ‘वक्त के बादशाह’ के लिए क्या-क्या नहीं करता रहा? हमेशा ही उस करना हुआ है। पहले से हीरो बनाता आया है पूजा अर्चना करता आया है, तारीफ करता आया है। शास्त्रोक्त देवताओं को सुरों को ही हीरो बनाता आया है। वे अपने समय के सब कुछ होते थे। फिर युग आ गया राजा-रानियों का क्योंकि वे ही सबके हृदय के ‘भावों’ को जमाने, जिमाने वाले आलंबन हो सकते थे! यह नियम अब तक जारी है। देशकाल के अुनसार देखें तो अब दो हजार नौ के आम चुनाव आने वाले हैं। कई हिन्दी राज्यों में भी चुनाव होने हैं। आठ -दस महीन के बाद सब कुछ युग आदि भी बदल जाना है। गद्दियां बदलनी हैं, राजा-रानी बदलने हैं सो लेखक सोचता है कि ऐसा अभी से क्या जुगाड भिड़ाए कि अगले साल के बाद के दिनों में उसका कम स कम एक पीएम हो यदि नहीं तो एक सीएम और एक केन्द्रीय मंत्री अपना हो यानी कि वह उसके नजदीकवालों में हो। जिस राजाओं को दरबार में साहित्य संगीत कलाओं आदि की जरूरत होती थी राजवैद्य होते थे उसी तरह आज के राजाओं के लिए भी सिस्टम हैं। ऐसे ही चलता है इसी के लिए साहित्यकारों को गहरी तैयार की करनी पड़ती है। पड़ रही है। क्या यह आत्मसंघर्ष नहीं है? अभी से सही-सही, ठीकठाक आसामी पर दांव लगाना है। उसके आगे-पीछे रहना है उसके चमच के चमचे के चमच को सांटे रखना है। सूचनाओं का आदान-प्रदान संग्रह करना है और सही वक्त पर सही शगुन देख बात करनी है। करियर का मामला है। बस उसकी पौबारह हुई नहीं कि अपनी गोटी लाल! आगे क्या होगा? कौन पीएम होगा? किस दल की सरकार होगी? यूपीए की? एनडीए की? तीसरा चौथा मोर्चा? उनके भीतर भी कौन है जिसे गद्दी संभालनी है? उनके कांटेक्ट कांटेक्ट के कांटेक्ट? क्या नंबर है? कब मिलते हैं? कहां? तुम कहां छिपे घनश्याम करो मत देरी दुख हरो द्वारका नाथ शरण मैं तेरी! लेखक का दिल इस गहन आत्मसंघर्ष में, विचारधारात्मक संघर्ष, भावनात्मक संघर्ष, चारुचारात्मक और दारूदारात्मक संघर्ष में रत है। सवाल गंभीर हैं। शायद खतरनाक भी। तय करो किस ओर हो तुम? कस्मै देवाय हविषा विधेम:? कोअस्मिन सांप्रतिम लोके? ये मामूली सवाल नहीं है। यही ‘पोलिटीकल लेाचा’ हो रहा है जो लेखक को संघर्ष के लोचे में डाल रहा है। संघर्ष का लोचा कठिन होता है। किसे-किसे संभालें दलित को दखें तो दलित में कौन से दलित को सांटें। वे भी तो बिखरे हैं कौन काम का है? ओबीसी देखें ता कौन से को सटाएं? ऐसा न हो कि सेवा अकारथ जाए? कांग्रेस में कौन है जिसे साहित्यकार बनाया जा सकता है? सोनिया जी हिंदी की कविता लिखने लगें ता कैसा रहे मगर उन तक पहुंच? राहुल भैया पर अभी कवितामंत्र मार सकते हैं? अटल जी तो अब कवियाने से रहे सो आडवाणी से लेकर अरुण जेतली तक क्या करें कि अपना कलम-मंत्र पहुंच जाए? भइया जी बड़े जटिल संघर्ष का लोचा चल रहा है?अपनी हिंदी में। भइया जी तो गए। अब किसे भइयाजी बनाएं? कोई बनन को तैयार ही नहीं लगता। कितना कठिन संघर्ष है? उसका लोचा है?

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