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भारत ने किया एनएसजी फतह

रीब 34 साल पहले जब भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया था तो उसकी तरफ अनेक उंगलियां उठी थीं। उसकी प्रतिक्रिया में एनएसजी का गठन हुआ जिसने भारत पर कई प्रतिबंध थोप दिए। लेकिन आज स्थितियां बदल चुकी हैं और वियना में एनएसजी की बैठक में 26 घंटे के गहन विचार-विमर्श के बाद भारत का 34 सालों का ‘परमाणु वनवास’ इतिहास बन चुका है। आज भारत परमाणु प्रौद्योगिकी के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। उस समय स्थानीय समयानुसार ठीक सुबह 11:56 का वक्त था। विदेश सचिव शिवशंकर मेनन दिल्ली फोन कर रहे थे। वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बता रहे थे कि ग्लोबल परमाणु अप्रसार के समर्थक देशों ने अपनी सहमति दे दी है। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) ने दो दिवसीय बैठक के एक दिन और लंबा खिंच जाने के बाद अंतिम तौर पर शनिवार को अर्से से चली आ रही इस धारणा को खारिा कर दिया कि परमाणु अप्रसार की दिशा में भारत कोई समस्या है। समूह ने माना कि दरअसल भारत परमाणु अप्रसार समाधान का हिस्सा है। संक्षेप में भारत को उसके ऊरा विकल्पों को शिथिल बनाने वाले उन कठिन प्रतिबंधों से मुक्ित मिल गई, जिनमें कहा गया था कि उसे 34 वर्षो तक विदेशों से परमाणु रिएक्टर और ईंधन खरीदने की अनुमति नहीं दी जा सकती। भारत के साथ परमाणु व्यापार करने पर एनएसजी के राजी होने के बाद यह पाकिस्तान और क्षरायल की श्रेणी से अलग खड़ा हो गया है। पाकिस्तान और क्षरायल परमाणु हथियार संपन्न दो ऐसे देश हैं जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है। इंटरकांटिनेंटल होटल की लॉबी में खड़े उत्साहित मेनन ने ‘हिन्दुस्तान’ से कहा कि वह शनिवार रात महा डेढ़ घंटे ही सोए हैं। मेनन सारी रात भारत को एनएसजी से समर्थन दिलाने के बार में सोचते रहे। एनएसजी की बैठक का सविराम सत्र शनिवार को 1:40 बजे शुरू हुआ जिसमें आयरलैंड, आस्ट्रिया और न्यूजीलैंड जसे कुछ सदस्य देशों की तरफ से अप्रत्याशित तौर पर विरोध के स्वर उठे। चीन की मंशा भी भारतीय प्रतिनिधिमंडल को दुखी करने की ही थी। इसी माहौल में भारतीयों और अमेरिकी प्रतिनिधियों के बीच राजनयिक कार्यवाही शुरू हुई, जिसके बाद अंतत: न्यूजीलैंड, आस्ट्रिया और आयरलैंड ने विरोध त्याग दिया। बुश प्रशासन इसमें करो या मरो की भूमिका में दिखा। आखिरकार अमेरिकी प्रयासों ने एनएसजी के 45 सदस्य देशों को यह समझाने में कामयाबी पा ली। चीन का मुद्दा अभी बाकी था। जॉर्ज बुश ने चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ से बात की। सबकुछ योजना के मुताबिक हुआ और चीन भी मान गया। एनएसजी की बैठक का अंतिम सत्र एक घंटे में ही निबट गया। तब तक हर चीज अपने रास्ते पर आ चुकी थी। मंजूरी का मतलब हालांकि डील को अभी अमेरिकी कांग्रेस की हरी झंडी मिलना बाकी है लेकिन भारत अब रूस और फ्रांस जसे परमाणु ईंधन आपूर्तिकर्ता देशों से परमाणु रिएक्टर और कााखिस्तान और मंगोलिया इत्यादि से परमाणु ईंधन खरीद सकेगा। सन् 1में परमाणु परीक्षण करने के बाद से भारत के खिलाफ पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से लगे परमाणु प्रतिबंध खत्म हो जाएंगे। भारत अब परमाणु जगत की मुख्यधारा का अंग होगा और देश के वैज्ञानिकों की असैनिक परमाणु तकनीक तक सहा पहुंच होगी। देश की ऊरा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अब विकल्प बढ़ जाएंगे। समझा जाता है कि सर्वप्रथम वह 1000 मेगावाट के आठ रिएक्टर खरीदेगा। इनमें चार अमेरिका से और दो-दो रूस व फ्रांस से होंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अचकन पर एक नया तमगा लगा है जो कि जुलाई 2005 से ही अमेरिका के साथ इस करार को करने के लिए पूरे जीजान से जुटे थे। जिस तरह से एनएसजी बैठक में अमेरिका ने भारत के पक्ष में पूरा दबाव बनाया उससे भारत और अमेरिका के रिश्तों को नए सिर से मजबूती मिली है। ं

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