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अब मर भी जायें, तो टीस नहीं रहेगी

इसी दिन के लिए तरस गये थे। आज जीवन सफल हो गया। जिंदगी भर हाड़-पसीना लगाकर यहां काम किया। क्या दिन था और क्या हो गया था। आज संतोष मिल गया है। अब न भी रहे, तो मन में टीस नहीं रहेगी। भर पेट खाना नहीं खाते थे। बच्चों की फीस नहीं दे पाते थे। लेकिन इसी उम्मीद में हाड़-तोड़ मेहनत करते रहे कि दिन फिरगा। आज दिन फिर गया। यह कहते हुए 65 वर्षीय रामजन्म सिंह की आंखे भर आयीं। भावुक हो कहते हैं ‘आप सोचते होंगे हम ऐसे ही कह रहे हैं। नहीं बाबू, यह आत्मा से निकली हुई आवाज है। इसी एचइसी ने हमको सबकुछ दिया। बेटा-बेटी को पढ़ाया। इसे कैसे मरते देख सकते थे। एरियर बकाया है। एलटीए भी नहीं मिला है। लेकिन संतोष कर लेते थे। एक दिन मिल जायेगा। अब तो गुरुाी भी कह दिये कि 100 करोड़ मिलेगा। एरियर का रास्ता भी साफ हो गया’। समारोह स्थल पर आज सभी के चेहर पर जो खुशी दिखी उसने एचइसी के स्वर्णिम दिन की याद ताजा कर दी। युवा, महिला, बुजुर्ग, कामगार, अधिकारी सभी काफी खुश थे। हर घोषणा से मौजूद लोगों में जोश भर जाता था। जम कर तालियां बज रही थीं। लाठी के सहार भी कई बुजुर्ग कड़ी धूप में पैदल ही नेहरू पार्क की ओर जा रहे थे। बैठने की जगह नहीं मिली, तो उसकी मलाल भी नहीं दिखा। धूप में खड़े होकर ही भाषण सुना। व्यवसायी भी गये थे। हालांकि औपचारिक आमंत्रण इन्हें नहीं था। लेकिन एचइसी के साथ इनकी संवेदना ही इन्हें खींच लायी। समारोह समाप्त होने के बाद जो भीड़ निकली उसने 70 के दशक की याद ताजा कर दी, जब शिफ्ट समाप्त होने के बाद सड़क पर चलने की जगह नहीं बचती थी।

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