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तमिल के कबीर

तमिल साहित्य में सवरेत्कृष्ट स्थान प्राप्त प्राचीन ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ के रचयिता तिरुवल्लुवर तमिलनाडु में महान कवि और अगस्त्य ऋषि के वंशज माने जाते हैं। इनका जन्म दो हाार वर्ष से काफी पहले होने का अनुमान है। सात भाई-बहनों में तिरुवल्लुवर सबसे छोटे थे। इनके पिता ‘भगवान’ के आदेश पर इनकी माता ‘आदि’ ने सातों संतानों को त्याग दिया था। शैशव अवस्था में त्यागे जाने पर तिरुवल्लुवर को एक दयालु दंपती ने पाला था। दूसरों के संरक्षण में हुए लालन-पालन तथा बुनकरी (ाुलाहा) कर्म व वैचारिक दृष्टिसाम्य के कारण इन्हें तमिल साहित्य का कबीर कहा जा सकता है। इनकी तमिल कृति ‘तिरुक्कुरल’ हिन्दी के अनेक संतों और अध्यात्मोन्मुखी भक्त कवियों को एकेश्वरवादी वाणी तथा मानव-प्रेम का मार्गदर्शन कराती है। हिंदी के दोहा छंद के समान तमिल के 1330 ‘कुरल’ छंदों वाला तथा मु. गो. वेंकटकृष्णन द्वारा हिंदी में दोहा छंद ही में अनूदित यह ग्रंथ मूलत: विद्वानों में ‘तमिल वेद’ का महत्व पाकर श्रद्धेय भले ही बना है, किंतु वर्णित विषयों में नैतिक बातों का तथा गृहस्थाचरणों का अधिकांश विषय इसे ‘मनुस्मृति’ के करीब लाता है। धर्म-अर्थ-काम नामक तीन कांडों में बंटी इस कृति में ‘धर्मकांड’ सर्वश्रेष्ठ है। ‘अर्थकांड’ में राज्य व राजनीति तथा अर्थव्यवस्था आदि व्यावहारिक मार्गदशक विषय हैं। अपेक्षाकृत छोटे ‘कामकांड’ में प्रेम की चर्चा है- ‘अर्गल है क्या जो रखे, प्रेमी उर में प्यार। घोषण करती साफ ही तुच्छ नयन-ाल धार।।’ ‘तिरुक्कुरल’ के अनूदित कुरल (दोहे) का मिलान कबीर के इस प्रेम-विषयक दोहे से किया जा सकता है- ‘प्रेम छिपाया न छिपै, जा घट परगट होय। जो पै मुख बोलत नहीं, नैन देते हैं रोय।।’ तमिल व हिंदी की इन दोनों महान हस्तियों का मानव-प्रेम पर जोर है- ‘प्रेम मार्ग पर जो चले, देह वही सप्राण। चर्म पलेटी अस्थि है, प्रेमहीन की मान।’ इस पर कबीर का बखान इसी ढंग का है- ‘जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान। जसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्रान।’

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  • Web Title: तमिल के कबीर