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शिविरों में कपड़ों का अभाव

राहत शिविरों में जिन्दगी की दो जरूरतें-भोजन और आवास की जरूरतें कमोवेश पूरी हो रही हैं। सिर्फ कपड़े का घोर अभाव है। कुछ संगठनों ने पीड़ितों के बीच कपड़े का वितरण किया है। ये काफी नहीं है। कपड़ा न होने का कारण है। बचाव में गए सेना के जवानों ने जान बचाकर निकल रहे लोगों को सावधान किया था कि वे अधिक सामान लेकर न निकले। सिर्फ देह लेकर चलें। जेवर और रुपये रख लें। कारण यह कि सामान कम रहे तो अधिक से अधिक लोगों को मोटर बोट पर लाया जा सकता है। लोगों ने सेना और बचाव के काम में लगे नागरिक प्रशासन की बात मानी। देह लेकर नाव पर सवार हो गए।ड्ढr ड्ढr अब कपड़ों के अभाव में परशानी हो रही है। औरतें अधिक परशान हैं। बिहार राज्य महिला आयोग की ओर से आयोजित पूर्णिया के एक शिविर में मधेपुरा जिला के कुमारखंड प्रखंड के टिकुलिया गांव से आए सियाराम यादव का परिवार 15 दिनों से स्नान नहीं कर पाया है। पत्नी और दो बेटियां सिर्फ एक कपड़े में आईं है। सियाराम के पास गंजी के अलावा एक गमछा भी है। वे खुद स्नान कर लेते हैं। सियाराम अकेले नहीं हैं। सभी शिविरों का यही हाल है। शिविरों में शरण लिए सैंकड़ों औरते कई दिनों से बगैर नहाए रह रही हैं। उमस भरी गर्मी में शिविरों में इतनी दरुगध फै ल जाती है कि सांस लेना भी दूभर हो जाता है। एक शिविर में बनमनखी (मिरचाबाड़ी, जानकीनगर) के कामेश्वर पासवान शरण लिए हैं। इनके सामने सिर्फ अपनी जान बचाने का एजेंडा था। पत्नी और बच्चे रिश्तेदारी में बनियापट्टी गांव गए थे। सब सुरक्षित हैं। मगर एक कपड़ा के चलते ये भी नहा नहीं पा रहे हैं। इन्हें सेना के जवानों ने 15 दिनों पहले निकाला। नहाए हुए भी ठीक 15 दिन हुए हैं। मुरलीगंज रहटा के सुलो साह का बेटा लवकुश कुमार सिर्फ पैंट और गंजी में निकल आया था। बच्चा है। कहीं नहा लेता है। यह सुविधा उसके मां-बाप को नहीं है। लवकुश का दाखिला इसी साल पहली कक्षा में हुआ है। वह स्कूल जाने के लिए अधिक बेचैन है। मुरलीगंज प्रखंड के डुमरिया के राजकिशोर ठाकुर पांच दिन पहले निकले। इनके परिवार में पांच सदस्य हैं। ठाकुर धोती-कुरता में निकले। गमछा भी नहीं ला पाए। पूर्णिया के शिविर में हैं। बताते हैं कि आखिरी बार 1अगस्त को स्नान किया था। याद होगा कि 18 अगस्त को कुशहा में तटबंध टूटा था।ं

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