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बुकर प्राइचा की दौड़ में दो भारतीय उपन्यासकार

विवादास्पद लेखक सर सलमान रश्दी साहित्य के क्षेत्र के प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार की दौड़ से बाहर हो गए। हालांकि उन्हें इस बात का कोई ज्यादा मलाल नहीं होगा क्योंकि 1में उन्हें उनकी कृति ‘मिडनाइट चिल्ड्रेन’ के लिए बुकर से नवाजा जा चुका है। जो भी हो, भारत इस बात पर गर्व कर सकता है कि पुरस्कार के लिए अंतिम सूची में उसके दो लेखक शामिल हैं। ये हैं अरविंद अदिगा और अमिताव घोष। अरविंद अदिगा को उनकी पहली ही कृति ‘द व्हाइट टाइगर’ के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है, वहीं अमिताव घोष को उनकी शोधपरक कृति ‘सी ऑफ पॉपीज’ के लिए सूची में शामिल किया गया। बुकर समिति के जज ने अंतिम छह किताबों की जो सूची जारी की, उसमें एकमात्र महिला लेखिका लिंडा ग्रांट हैं। ग्रांट को वर्ष 2002 में भी नामजद किया गया था, लेकिन उन्हें पुरस्कार नहीं मिल सका था। इससे पहले 2ाुलाई को वर्ष 2008 के बुकर पुरस्कार की दावेदारी के लिए जिन 13 किताबों की सूची जारी की गई थी, उनमें सलमान रश्दी का नाम भी था। उन्हें उनकी पुस्तक ‘एनचैंट्रीा ऑफ फ्लोरंस’ के लिए सूची में रखा गया था। उनके अलावा पेशे से पत्रकार व बीबीसी उर्दू सेवा के प्रमुख रहे लेखक मोहम्मद हनीफ को भी इस सूची में शामिल किया गया था। पहली सूची जारी होने के बाद के पहले हफ्ते में रश्दी के उपन्यास की बिक्री में 50 फीसदी का क्षाफा आ गया था। सटोरिए लैड ब्रौक्स ने तो यह तक घोषणा की थी कि रश्दी के अन्य दावेदारों के मुकाबले पुरस्कार को अपनी झोली में डालने की चार गुना अधिक संभावना है। लेकिन मंगलवार को जारी अंतिम छह लेखकों की सूची में रश्दी और एक और तगड़े दावेदार ओ नील जगह नहीं पा सके। अदिगा, घोष और ग्रांट के अलावा सूची में स्टीव टॉल, फिलिप हेनशर और सेबास्टियन बैरी के नाम शामिल हैं। महा 34 साल के अदिगा की पुस्तक ‘द व्हाइट टाइगर’ एक गरीब हलवाई की कहानी है, जो अपनी ही तरीके से दुनिया को देखता-समझता है। वहीं, अमिताव की ‘सी ऑफ पॉपीज’ में उन्होंने बड़े ही दिलचस्प अंदाज में यह साबित करने की कोशिश की है कि अफीम किस तरह से ब्रितानी साम्राज्य की बुनियादी ताकत थी।

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