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महाप्रयोग में झारखंड का लाल भी

ब्रह्मांड की उत्पति के रहस्य से परदा उठाने के लिए अहम बन गये 10 सितंबर 2008 के दिन ने विश्व को रोमांचित कर दिया है। झारखंड का एक लाल और रांची यूनिवर्सिटी के छात्र रहे सिद्धार्थ कुमार प्रसाद भी जेनेवा में अन्य वैज्ञानिकों के साथ इस महाप्रयोग में जुटे हैं। यूरोपियन सेंटर फॉर न्यूक्िलयर रिसर्च के कोलकाता से जुड़े श्री सिद्धार्थ फिलवक्त जेनेवा में हैं।ड्ढr वहां से उन्होंने फोन पर बताया कि फ्रांस और स्वीटारलैंड की सीमा पर भूगर्भ में स्थित परीक्षण सेंटर से जुड़े मुख्य कंट्रोल रूम में वे कंप्यूटर से डेटा रिव्यू करनेवाली टीम के सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया इस रिसर्च को लेकर भयभीत है, परंतु ऐसा कुछ भी होनेवाला नहीं है।ड्ढr इस तरह के रिसर्च पहले भी अमेरिका में हो चुके हैं, परंतु उससे अलग इस मायने में है कि यह बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। फिलहाल तय समय के अनुसार बुधवार को दोपहर 12.30 बजे रिसर्च शुरू हो जायेगा। सिद्धार्थ कुमार सिमडेगा के ठेठईटांगर प्रखंड के कोनबेगी गांव निवासी कृष्ण प्रसाद के चौथे पुत्र हैं। 30 वर्षीय सिद्धार्थ ने नवोदय विद्यालय घाघरा-गुमला से मैट्रिक और इंटर करने के बाद रांची विवि से फिािक्स से बीए आनर्स और एमएससी की डिग्री हासिल की। इसके बाद प्रतियोगिता के आधार पर तीन वर्ष पूर्व इनका चयन यूरोपियन सेंटर फॉर न्यूक्िलयर रिसर्च के लिए हुआ था। तब से वे वहीं कार्यरत हैं। सद्धार्थ के अलावा इसी संस्थान के तीन अन्य वैज्ञानिक भी डेढ़ माह पूर्व से जेनेवा में हैं। हालांकि भारत से करीब 20-25 वैज्ञानिक इससे जुड़े हैं।ड्ढr इस महाप्रयोग के लिए जेनेवा गये भारतीय वैज्ञानिकों में डॉ जुबैर अहमद, प्रेम घोष, सतीश शर्मा, प्रो एमएम अग्रवाल और प्रो राघव वर्मा प्रमुख हैं। ब्रह्मांड की खोज का आगाज स्थान : फ्रांस-स्विटारलैंड की सीमा पर जमीन के 330 फुट नीचे 27 किमी लंबी सुरंग।ड्ढr मशीन : दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी मशीन लार्ज हाइड्रेान कोलाइडर, जिसमें 35,100 टन की छह मशीन।ड्ढr शामिल वैज्ञानिक : 85 देशों के 8000।ड्ढr समय : दोपहर के 12.30 बजे।ड्ढr दुनिया के प्रमुख भौतिकविद बुधवार को फ्रांस-स्विटारलैंड सीमा के निकट सतह से 100 मीटर गहर स्थापित एक महामशीन में विज्ञान के इतिहास का सबसे बड़ा प्रयोग शुरू करंगे। इसके जरिये उन्हें उम्मीद है कि वे ब्रह्मांड में पदार्थ के जन्म और उसके बाद संपन्न तमाम प्रक्रियाओं से जुड़ी गुत्थियों को खोल सकेंगे।ड्ढr लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) नाम की यह महामशीन असंख्य नाभिकीय कणों (प्रोटॉन) को प्रकाश की गति से 27 किमी लंबी सुरंग में दौड़ा कर उनकी टक्कर करायेगी। लाखों कंप्यूटरों की आखें इन टकराहटों पर लगी होंगी और वहां जो कुछ घटेगा, उसे सेकेंड के करोडंवें हिस्से तक रिकॉर्ड किया जायेगा। जूरा पहाड़ियों की घाटी में बनी विश्वविख्यात सर्न प्रयोगशाला में वैज्ञानिक इस महाप्रयोग से ब्रह्मांड के जन्म की अनसुलझी अवधारणाओं को परखेंगे, जिन्हें अब तक ‘डार्क मैटर’, ‘डार्क इनर्जी’, एक और डाइमेंशन या वैज्ञानिक बिरादरी के बीच सबसे चर्चित जुमले ‘हिग्स बोसॉन’ व ‘गॉड पार्टिकिल’ के नाम से पुकारा जाता रहा है। सर्न के फ्रेंच डायरक्टर रॉबर्ट आयमर कहते हैं, ‘एलएचसी का प्रयोग ब्रह्मांड के बार में हमार नजरिये को उलट सकता है।’इस बीच सर्न के वैज्ञानिक इस प्रयोग से बार में फैली उन बेसिरपैर की अफवाहों को दूर करने की भी जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं, जिनके मुताबिक नाभिकीय कणों की टक्कर से तीव्र गुरुत्वाकर्षण वाले छोटे-छोटे ब्लैक होल बन जायेंगे, जो पूरी दुनिया को निगल सकते हैं। इन अफवाहों को एक जर्मन रसायनशास्त्री ऑट्टो रोसलर की आशंकाओं ने जन्म दिया है। वैज्ञानिकों ने अफवाहों को वाहियात और कुछ लोगों का षडयंत्र बताते हुए कहा कि प्रयोग को सुरक्षित बताया है। दरअसल, एलएचसी महाप्रयोग के जरिये वैज्ञानिक 15 अरब वर्ष पहले हुई उस ब्रह्मांडीय घटना को प्रयोगशाला में दोहराना चाहते हैं, जिसे विज्ञान की दुनिया में ‘बिग बेंग’ के नाम से जाना जाता है। नौ अरब डालर की लागत से होने वाले इस प्रयोग पर दुनिया की निगाहें हैं। परहॉकिंग ने लगायी सौ डॉलर की शर्त लंदन। ्र मशहूर खगोलविद स्टीफन हॉकिंग ने सौ डॉलर की शर्त लगाते हुए दावा किया है कि एलएचसी का महाप्रयोग अंतरिक्ष विज्ञान की सबसे बड़ी गुत्थी को खोल पाने में कामयाब नहीं होगा। उन्होंने कहा कि एलएचसी के जरिये हम टकराने वाले नाभिकीय कणों की ऊरा को उतना ही बढ़ा सकेगी कि इनकी पारस्परिक अंतक्रिया को मात्र चार गुना ज्यादा बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि अभी यह माना जाता है कि इतने भर से हिग्स कणों को सिद्ध किया जा सकेगा। लेकिन मेर खयाल से यह इतना आसान नहीं और मैं सौ डॉलर की शर्त लगाने को तैयार हूं, प्रो. हिग्स का ‘गॉड पार्टिकिल’ नहीं मिलने जा रहा। उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश भौतिकविद पीटर हिग्स ने 1में यह प्रतिपादित किया कि भारहीन नाभिकीय कण एक मध्यस्थ के संपर्क में आने पर द्रव्यमान हासिल करते हैं। यह काल्पनिक मध्यस्थ हिग्स बोसॉन या गॉड पार्टिकिल के नाम से मशहूर है। महाप्रयोग के साक्षी हैं भगवान नटराज भी नयी दिल्ली। ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके बाद की तमाम प्रक्रियाओं से जुड़ी गुत्थियों को खोलने के लिए फ्रांस और स्विटरलैंड सीमा के निकट शुरू हुए महाप्रयोग में भारतीय वैज्ञानिकों के अलावा सृजन और विनाश के देवता नटराज भी भी अनूठी भूमिका में हैं। न्यूक्िलयर साइंस सेंटर के निदेशक डॉक्टर अमित रॉय कहते हैं कि 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में जिस जक पर असंख्य नाभिकीय कणों को लेकर जो महा मशीन लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर दौड़ेगी उसका निर्माण हमार वैज्ञानिकों ने किया है। इस महाप्रयोग में टाटा इंस्टीटय़ूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और भाभा एटोमिक एनर्जी सेंटर जसे प्रतिष्ठित संस्थानों के 100 से अधिक भारतीय वैज्ञानिक अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। यहां यह भी दिलचस्प है कि परमाणु ऊरा आयोग ने जेनेवा के निकट स्थित यूरोपीयन ऑर्गनाक्षेशन ऑफ न्यूक्िलयर रिसर्च (सीईआरएन) को दो मीटर ऊंची कांसे की नटराज की एक प्रतिमा भेंट की थी। इसे वहां स्थापित किया गया है।

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