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कुपोषण के विरुद्ध चार मोर्चे

ुछ दिनों पहले पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह बता रहे थे कि उनकी पोती उसी दिन पैदा हुई थी जिस दिन फ्लाइट आईपी 804 अगवा करके कंदहार ले जाई गई थी। वह 1े क्रिसमस की पूर्व संध्या थी। हाक्षैकिंग की खबर 4.30 बजे आई और उनकी पत्नी ने 5.30 बजे फोन करके बताया कि ‘बेटी पैदा हुई है’ और ‘घर में लक्ष्मी आई है।’ लेकिन जसवंत सिंह 8.30 बजे के बाद ही अपनी नवजात पोती को चंद मिनटों के लिए देखने जा पाए क्योंकि इस बीच हवाई जहाज पहले अमृतसर, फिर लाहौर फिर कंदहार पहुंचा था। बच्ची रो रही थी, उनके इंतजार में। उनके यहां परंपरा यह है कि नवजात शिशु को सबसे पहले दादा के हाथों घुट्टी पिलाई जाती है। थके हार जसवंत सिंह ने बच्ची के मुंह में शहद और गंगाजल की एक बूंद डाली। यह एक ऐसे व्यक्ित का आशीर्वाद माना जाता है जिसके गुण बच्चे में आने की उम्मीद की जाती है। राज्यसभा के उपसभापति रहमान खान, जसवंत सिंह की बगल में ही बैठे थे। उन्होंने यह प्रसंग सुन कर कहा कि उनके यहां भी ऐसी ही प्रथा है। लगभग समूचे भारत की यही कहानी है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म के बाद पहले घंटे में मां का दूध बाल कुपोषण से लड़ने के लिए और प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए जरूरी है। जसवंत सिंह एक राष्ट्रीय संकट की वजह से अपनी पोती तक नहीं पहुंच पाए। लेकिन और बच्चों को पहले घंटे में मां का दूध प्रचलित मान्यताओं की वजह से नहीं मिलता। ऐसा नहीं है कि ये मान्यताएं सिर्फ अनपढ़ परिवारों में हैं। जसवंत सिंह आखिरकार राजस्थान के एक प्रमुख, शिक्षित परिवार से हैं और केन्द्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। रहमान खान कर्नाटक के मुस्लिम समुदाय से हैं और वे भी शिक्षित, प्रतिष्ठित खानदान से हैं। ऐसे समुदाय भी हैं जिनमें मां का पहला गाढ़ा, पीला सा दूध ‘अशुद्ध’ माना जाता है और स्तनपान शुरू करने के पहले उसे निकाल दिया जाता है।इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि सिर्फ 25 प्रतिशत भारतीय माताएं यह ‘कुदरत का करश्मिा’ अपने बच्चों को देती हैं, जो कुपोषण से लड़ने में सहायक हो सकता है और हर साल भारत में 2.5 लाख नवजात बच्चों की जान बचा सकता है। भारत में तीन साल तक ही उम्र का हर दूसरा बच्चा कुपोषित है। यह आंकड़ा चीन से पांच गुना है और सब सहारा अफ्रीका से दुगना है। इससे निपटने के लिए नीति निर्माताओं को लीक से हट कर कुछ करना होगा। जन्म के बाद पहले घंटे में स्तनपान बाल कुपोषण और बाल मृत्यु के खिलाफ लड़ाई में एक जरूरी मोर्चा हो सकता है। दुनिया भर के विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं। इसे अब बच्चे का पहला ‘वैक्सीन’ माना जाता है। दूसरा जरूरी मोर्चा, जिस पर विशेषज्ञ सहमत हैं, वह है पहले छह महीने तक बच्चे को सिर्फ स्तनपान कराना। इसका अर्थ है कि बच्चे को न अन्न, न दूसरा कोई दूध, यहां तक कि पानी भी नहीं दिया जाता। अनुभवजन्य प्रमाण बताते हैं कि इससे बच्चे में संक्रमणों का प्रतिरोध तैयार होता है और दस्त और न्यूमोनिया से होने वाली मौतें आधी हो सकती हैं। सिर्फ स्तनपान से बच्चे को भविष्य के लिए ‘पोषण सुरक्षा’ मिल जाती है। भारत में यह माना जाता है कि चूंकि हमारा समाज एक परंपरावादी समाज है इसलिए यहां स्तनपान एक स्वाभाविक बात है, हालांकि बहुत सारी औरतें घर के बाहर काम करने जाती हैं। लेकिन असलियत यह है कि 72 प्रतिशत भारतीय महिलाएं बच्चों को सिर्फ अपना दूध नहीं पिलातीं। वे इसके फायदे और दूसरा दूध या पानी पिलाने के नुकसान नहीं जानतीं। आधे भारतीय बच्चों को 6 महीने से 2 साल तक की उम्र तक जरूरी पोषक तत्वों वाला पूरक आहार नहीं मिलता और यह तीसरा तुरंत फतह करने वाला मोर्चा है। इसमें कोई शक नहीं कि बच्चे के जीवन के पहले 2 साल में जो नुकसान हो चुकता है उसकी बाद में भरपाई मुश्किल होती है। नए प्रमाण बताते हैं कि अगर बच्चे का वजन 2 साल के बाद तेजी से बढ़ता है तो उसे भविष्य में लंबी चलने वाली बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। यह स्पष्ट है कि बाल कुपोषण के खिलाफ जंग में जीतने के लिए 0-2 आयुवर्ग पर नीतियों को केन्द्रित करना जरूरी है। वक्त पर टीके लगवाने और दस्त के लिए ओआरएस पर नए सिर से जोर देना जरूरी है। लेकिन चौथा तुरंत जीतने वाला मोर्चा है हर बच्चे को साल में दो बार विटैमिन ए साइरप और पेट के कीड़े मारने की दवा दी जाए। कुछ सांसदों का मत है कि इसे पल्स पोलियों कार्यक्रम के साथ जोड़ दिया जाए, जिसके लिए ढांचा बन चुका है। इससे ज्यादा बच्चों तक इसके फायदे तुरंत पहुंच सकते हैं। यह सब कितना सरल लगता है। लेकिन पेच यह है कि इसमें नेतृत्व की पहल, राजनैतिक इच्छाशक्ित, व्यावहारिक समझ और बजट की जरूरत है। कोई भी कार्यक्रम बिना बजट के नहीं शुरू हो सकता। अगर सिर्फ स्तनपान उतना महत्वपूर्ण है जितना विशेषज्ञ बता रहे हैं तो इसके प्रोत्साहन के लिए पैसे की जरूरत होगी। सरकार ने आईसीडीएम कार्यक्रम के लिए रकम बढ़ाकर इस साल 52,000 करोड़ रुपए कर दी है। ग्यारहवीं योजना के मसौदे में पहले स्तनपान के प्रोत्साहन के लिए रोड़ रुपए निर्धारित थे। प्रधानमंत्री इसके कट्टर समर्थकों में से थे। योजना यह थी कि हर ब्लॉक के लिए 5 लाख रुपए रखे जाएं। इसका कुल जमा 1258 करोड़ रुपए होता है लेकिन बाद में इसे घटा कर रोड़ रुपए कर दिया गया। लेकिन जब पिछले दिसम्बर में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में 11वीं योजना का दस्तावेज प्रस्तुत किया गया तो उसमें से स्तनपान के प्रोत्साहन के लिए रकम का प्रावधान रहस्यमय रूप से गायब था। हालांकि पुनर्गठित आईसीडीएम के प्रस्ताव में इस पर नोट था, मीडिया ने इसके बार में लिखा और योजना आयोग के सदस्यों ने इसकी सार्वजनिक घोषणा भी की थी। हम जानते हैं कि अक्सर सरकार के दाहिने हाथ को नहीं मालूम होता कि बायां हाथ क्या कर रहा है, और विभिन्न लॉबी आखिरी क्षण तक अपने फायदे की चाीजों को जोड़ने और उनके स्वार्थ पर चोट पहुंचाने वाली चीजों को हटाने में सक्रिय रहती हैं, भले ही बच्चों की जिंदगी का सवाल क्यों न हो। अच्छी खबर यह है कि देश के नीति निर्धारकों में ऐसे लोग हैं जो समझते हैं कि भारत की विकास कथा आगे नहीं बढ़ेगी। अगर कुपोषण का काला धब्बा बना रहा और मूल्यवृद्धि और खाद्यान्न संकट के दौर में समस्या बढ़ती जाएगी। प्रधानमंत्री कार्यालय सोच रहा है कि बाल कुपोषण पर प्रगति को आंकने के लिए प्रधानमंत्री की सीधी देखरख में एक राष्ट्रीय अथॉरिटी बनाई जाए। और कुछ नहीं तो इससे इस मुद्दे को ज्यादा चर्चा और प्राथमिकता मिलेगी और सरकारी तंत्र को जरूर धक्का लगेगा। हम यह जान लें। भारत विश्वस्तर पर एक विश्वस्तरीय भूमिका तब तक नहीं निभा सकता, जब तक उसके आधे बच्चे कुपोषित हैं। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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