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बाढ़: प्रलय के दौर में वोट की फसल

वास्तविक युद्ध में भी युद्ध विराम होता है, लेकिन कोसी की महाविपदा की घड़ी में बिहारी नेता वाक्युद्ध विराम की घोषणा नहीं कर रहे हैं। बदलाव की इस जमीन पर बिहारी नेता एक साथ मिलकर राज्य को विपदा से उबारने के बदले राजनैतिक लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसा कर वे देश और दुनिया के सामने बिहार के गौरव और नाम में चार चांद नहीं लगा रहे। महाप्रलय की इस घड़ी में गांवों और राहत कैम्पों में बड़े-छोटे,ऊंच-नीच और जाति-धर्म का बंधन टूट गया है। लेकिन बिहारी नेता राग- द्वेष ,पार्टी लाइन और अपने बैनरों को नहीं छोड़ रहे हैं। वे नौ कन्नौजिया, दस चूल्हे वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। कोसी के प्रलय की घड़ी में बिहार के बड़े नेताओं का समूह बीस दिन गुजर जाने के बावजूद एकसाथ नहीं बैठ सका है। एक साथ बैठ कर वे 30-40 लाख की आबादी को राहत पहुंचाने के लिए,उन्हें जीवन देने के लिए खांटी बिहारीपन का प्रदर्शन नहीं कर सके हैं। क्या इससे कोसी की धार में समा कर बह गए लोगों की आत्मा और क ष्ट भोग रहे लाखों लोगों को आशा की किरण और दिल में जीने का जज्बा पैदा हो पाएगा? विपदा की इस घड़ी में बिहार से बाहर रहने वाले लोगों के उठे हाथों और उन सैनिकों के जज्बे आगे सिर झुकाइए जो अपना घर-बार छोड़कर कोसी के पेट से लोगों के जीवन की रक्षा कर रहे हैं। उन असंख्य लोगों के जज्बे का सम्मान कीजिए जो अपने अनजाने-अनचिन्हे बिहारी भाइयों के लिए कपड़े-लत्ते और खाने-पीने के लिए पैकेट भेज रहे हैं। उस ग्रामीण समाज के लोगों से सीखिए जो सरकारी राहत के पहुंचने का इंतजार किए बिना खुद लग गए। उन असंख्य लोगों के संदेश का सम्मान कीजिए जो सड़कों पर निकलकर राहत के सामान बटोर रहे हैं। उन स्कूली बच्चों के जज्बे में छुपे हुए संदेश को पढ़िए जिसने अपनी मां से कहा - मां, पैकेट में माचिस और मोमबत्ती डालना मत भूलना। बिहार की धरती ऐसे पुत्रों को बरसों-बरस तक याद रखेगी जिन्होंने पीड़ितों के आंसू पोछे। विपत्ति में लाखों लोग फंसे हैं,लेकिन बिहारी नेताओं के वाक्युद्ध का आलम यह है कि रलमंत्री लालू प्रसाद कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने उन्हें फ ोन नहीं किया। वे घमंडी हैं। रलमंत्री लालू प्रसाद द्वारा उठाए जा रहे सवालों के बार में पूछे जाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार झुंझला कर कहते हैं उनके बार में मुझे बात नहीं करनी। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को आदत है 48 घंटे घूमकर 48 बार मीडिया से बात करने की। यही उनका असली ‘रिलीफ आपरशन’ है। बात यहीं खत्म नहीं होती। एक दूसर को स्टेपनी बताता है तो दूसरा उन्हें महान झूठा बताता है। वे चैनलों पर खूब गराते-बरसते हैं। जबकि बारिश और बाढ़ का खतरा अब भी मौजूद है। एक-दूसर पर गराने और बरसने वाले नेताओं को जमीन पर उतर कर एक सप्ताह कैम्प करने की फुर्सत नहीं। क्या यही बिहार को बचाने का जज्बा है? जो कुछ हो रहा है ,यह सारा कुछ बिहारी पहचान को खंडित करता है। इस भारी विपदा में नेताओं का समूह एक-दूसर क ोसने के बदले अगर एकसाथ कुछ पल के लिए बैठ कर सोचता तो वे लाखों लोगों और अपने नीचे के कार्यकर्ताओं को मैसेज दे सकते थे जो एक महान सकारात्मक भूमिका अदा करता। ऐसा नहीं होने के कारण घाव पर मरहम-पट्टी के बदले नेताओं का यह समूह बयानबाजी में घंटों अपना श्रम और समय बर्बाद करता है। बिहार एक तरफ कोसी के विध्वंस को झेल रहा है तो दूसरी तरफ उत्तर बिहार के जिले सूखे की मार झेल रहे हैं। यही हालत रही तो स्थिति और गंभीर होगी। यह सच है कि एफलक्स बांध को बचाने के लिए सरकार सचेष्ट नहीं हुई। लेकिन क्या यह लड़ने का वक्त है? पर पीड़ितों के जीवन में नया रंग भरने की बात कौन कहे-एक पंद्रह साल के कुशासन की कथा बांच रहा है तो दूसरा तीन साल के सुशासन को कुशासन बता उसकी पोल खोल रहा है। 21वीं सदी में इस प्रलय की घड़ी में बिहारी नेताओं का यह छद्म युद्ध, पीड़ा पहुंचाने वाला है। जनाब वोट की फसल तभी काटोगे जब वोट देने वाले जिंदा रहेंगे। बिहार के गांधीवादी विचारक राी अहमद ने शायद ठीक ही कहा कि कोसी मैया और बिहारी नेताओं से प्रार्थना कीजिए कि एकसाथ मिलकर पीड़ित मानवता की सेवा करं। लेखक हिन्दुस्तान पटना से जुड़े हैं।

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