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भागवत धर्म

मानव धर्म ही भागवत धर्म है। भागवत धर्म के तीन तत्व हैं- विस्तार, रस, सेवा। मनुष्यों में कुछ सहजात वृत्तियाँ है। जैसा मनुष्य है, वैसे ही पेड़-पौधे भी हैं। उन में कुछ ऐसे गुण हैं, जो पेड़-पौधे में भी हैं, दूसरे जीवों में भी हैं और मनुष्य में भी हैं। ऐस कुछ गुण और लक्षण हैं, जो पेड़-पौधे में नहीं हैं मगर दूसरे जीवों में है। कुछ ऐसे विशेष गुण हैं, जो सिर्फ मनुष्य में है, अन्य जीवों में नहीं हैं। जैसे पेड़-पौधे हैं, और जानवर हैं, दोनों एक नहीं है, मगर दोनों जीव हैं। मनुष्य में कुछ अपनी विशेषता है, वैसे ही और जीवों में भी है। मनुष्य से और जीवों का पार्थक्य है- मनुष्य में है विस्तार, रस और सेवा। मनुष्य का स्वभाव है बढ़ने का प्रयास करना। अपने मन को जो हमेशा बढ़ाना चाहता है, जो विस्तार की अभिलाषा है, यह मनुष्य का स्वभाविक धर्म है। दूसरा है रस। मानव धर्म में एक चीज है जो दूसरे जीवों में नहीं है, वह है रस। ‘रस’ माने प्रवाह। परमपुरुष का अनादि से अनन्त काल तक एक प्रवाह चल रहा है, जो परमपुरुष का सहज स्वभाव है। परमपुरुष हमेशा स्व-भाव में स्थित है। मनुष्य भी चाहते हैं कि उनके भाव के साथ अपने आपको मिला दें। जब मनुष्य सार्थक होता है, सफल होता है तब उनकी इच्छा पूर्ति होती है। तीसरा है- सेवा। सिर्फ मनुष्य ही जानता है कि वह मनुष्य है। पेड़-पौधे, जानवर नहीं जानते हैं कि उनका परिचय क्या है? केवल मनुष्य जानता है, उसका नाम मनुष्य है। मनुष्य यह समझता है कि उनके जो प्ररक हैं, वे हैं परमात्मा। अत: हर जीव के साथ उनका भाई-भाई का सम्बन्ध है। इस बराबरी का ज्ञान रहन के कारण ही मनुष्य और जीवों से श्रेष्ठ है। परमपुरुष सन्तुष्ट तब होंगे जब उनकी संतानों की तुम सेवा करोगे। केवल मनुष्य ही परम पिता की संतान हैं ये बात नहीं है, जानवर और पेड़-पौधे भी उन्हीं की सन्तान हैं। इसलिए सबों की सेवा करना है।

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