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कहीं भय, कहीं कौतूहल, कहीं बेफिक्री का आलम

कहीं भय, कहीं रोमांच और कौतूहल, तो कहीं बेफिक्री का आलम। कोई घर की देहरी से बाहर कदम रखते हुए ठिठका, तो कोई तमाम आशंकाओं को झाड़कर रो की तरह अपने डेस्टिनेशन पर निकल पड़ा। कुछ ने जेनेवा से आनेवाले अपडेट के लिए टीवी पर नजर लगा रखी थी, तो कोई राह चलते दूसर से पूछ रहा था- क्या भाई महाटक्कर हो गयी? हम भी निकले लोगों के दिलों का हाल पूछने।ड्ढr रिक्शाचालक अरुण को विश्व के सबसे बड़े वैज्ञानिक परीक्षण के बार में कुछ नहीं पता। वह अन्य दिनों की तरह ही सुबह अपना रिक्शा लेकर निकल पड़ा था सवारी की तलाश में। पूछने पर कहा : मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूं। मुझे क्या पता कि क्या होने वाला है। जो होगा देखा जायेगा।ड्ढr गीता टेक्नोलॉजी में काम करनेवाले संजय कुमार सिंह दिन के 11 बजे कार्यालय जा रहे थे। एलएचसी एक्सपेरिमेंट को उन्होंने साधारण प्रक्रिया बताते हुए कहा, जिन लोगों में आत्मविश्वास नहीं है, वही इस तरह का भ्रम फैला रहे हैं कि दुनिया खत्म हो जायेगी। वैज्ञानिक बेवकूफ नहीं हैं। वीमेंस कॉलेज में क्लास करने जा रही छात्रा तुहिना ने पूछने पर कहा कि जेनेवा में हो रहे एक्सपेरिमेंट के बार में पेपर में पढ़ा, लेकिन इसको लेकर भ्रम में नहीं रहना चहतीं। आज तक कई परीक्षण हुए हैं और कई बार लोगों ने इस तरह की अफवाह फैलायी है। इंजीनियर एसके मुखर्जी भी सुबह निकल पड़े अपने काम पर। उन्होंने कहा कि जमीन के नीचे जो सुरंग बनायी गयी है, उसका डायमिटर बहुत ही कम है। एसे में पृथ्वी का छोटा हिस्सा ही प्रभावित हो सकता है। डरने की कोई बात ही नहीं। शॉपर्स मार्ट के बाहर खड़े गार्ड चैतन्य स्वांसी कहते हैं वैज्ञानिक अपनी बुद्धिमानी दिखा रहे हैं। प्रलय की बात मेर हिसाब से महा अफवाह है। जिंदगी एसे ही चलती रहेगी। एक दुकान में काम करनेवाले पवन अन्य दिनों की तरह बुधवार को भी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में लगे थे। उनका दृढ़ विश्वास है कि प्रकृति द्वारा बनायी गयी संरचना को इंसान खत्म नहीं कर सकता है। दुकान में काम करनेवाले धर्मेद्र साव कहते हैं कि सारी दुनिया खत्म होगी, तो मैं भी नहीं रहूंगा। इसमें घबराने की कोई बात नहीं। 11वीं के छात्र फिरो और प्रभात ट्यूशन पढ़ने के लिए सुबह ही घर से निकले थे। उनके चेहर पर न तो खौफ था, न चिंता। उनका कहना था कि वैज्ञानिक जरूर कुछ न कुछ हल निकालेंगे। मीडिया को मैटर चाहिए। इसलिए इसे उछाला जा रहा है। हर दिन की तरह आज भी अपनी गाड़ी लेकर निकल पड़े महादेव थोड़े चिंतित दिखे। कहा : एक न एक दिन तो मरना ही है। इसे लेकर ज्यादा सोचने की बजाय काम करते रहना ही बेहतर है। नीना दत्ता सब्जी लेकर घर जा रही थीं। वैज्ञानिक परीक्षण के बार में उन्हें पता है, कहती हैं कि इससे घबराने की कोई बात नहीं है। इससे विध्वंस होना जरूरी नहीं। राजमिस्र्ी कुशल और जगदीश ने कहा कि भगवान की बनायी दुनिया को इंसान नहीं मिटा सकता। भगवान जिस दिन चाहेगा उस दिन कोई नहीं बचेगा। चाटवाला मिथिलेश का कहना था कि दुनिया प्रकृति की देन है। उसकी इच्छा के बिना दुनिया खत्म नहीं होनेवाली। इस्ट प्वाइंट स्कूल में बच्चे को लेने आयी रूपा के अनुसार यह सिर्फ अफवाह है। डरने की कोई बात ही नहीं। दर्जी मोहम्मद शमीम ने कहा कि क्या करूं घर से निकलना तो पड़ेगा ही। काम नहीं करंगे तो कैसे चलेगा। मर जायेंगे-यह सोचकर काम कैसे नहीं करं, अगर बच गये तो क्या खायेंगे। महाप्रयोग से कुछ रहे बेखबर, तो कुछ की निगाहें टीवी पररांची। खुखरी पेट्रोल पंप में कार्यरत रीना थापा ने कहा उसे तो रात भर नींद ही नहीं आयी। बार-बार उसे अपने बच्चों का ख्याल आता रहा। क्योंकि उसके दोनों बच्चे शहर से बाहर रहते हैं। उसे लगा कि यदि महाप्रलय आ गया तो उसके बच्चों का क्या होगा। अब वह राहत की सांस ले रही है।ड्ढr वीमेंस कॉलेज की छात्रा पूजा कुमारी का मानना था कि महाप्रलय जसी कोई घटना नहीं घटने वाली है। वह कहती है कि यदि ऐसा होता तो बुर लोग तो अपनी सजा भुगतने से बच जाते न। क्योंकि वह यह भी मानती है कि सभी कर्मो का फल यहीं मिलने वाला है।ड्ढr नामकुम के मनोज कुमार महाप्रलय की खबर से काफी डर हुए थे। उन्होंने अपने बच्चे को स्कूल से जल्दी लाना ही उचित समझा। उन्होंने कहा : महाप्रलय आ जाये, तो कम से कम वह और उसके परिवार के लोग एक साथ रहें। उसके गांव में रात से ही डर का माहौल बना बना हुआ था और लोग कई तरह की बातें कर रहे थे। खिजरी के अनूप महतो ने कहा कि महाप्रलय की बात बकवास है। जब वैज्ञानिक कुछ करते हैं तो सब कुछ सोच समझ कर ही करते हैं। उसने कहा कि उसने ऐसी अफवाह पर ध्यान देने के बजाय आम दिनों की तरह काम पर निकले।ड्ढr चाय बागान के धीरन्द्र ने भी महाप्रलय को अफवाह ही माना। कहा कब 12 बज कर पार हो गया, पता ही नहीं चला। सब कुछ तो पहले की तरह सामान्य रहा और लोग अपने कार्य में लगे रहे। उसने कहा कि सच का सामना करना चाहिए। यही डर के बाद की जीत है।ड्ढr डॉ करमा उरांव का मानना है ऐसा प्रयोग कर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा प्रयोग में जो अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं, उनका प्रयोग दुनिया के भूखे और नंगे लोगों के हित में करना चाहिए था। डॉ उरांव मानते हैं कि विकास एक सतत् प्रक्रिया है, अत: महाप्रयोग की जगह जरूरतमंदो की प्राथमिकता देनी चाहिए थी। उन्होंने प्रयोग की सफलता पर भी संदेह व्यक्त किया।ं

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