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ब्लॉग वार्ता: अयोग्य मर्द और रामपुरी चाकू का दर्द

हो सकता है, यह बात किसी भारतीय मर्द को ठीक न लगे। कोई महिला यह कह दे कि वह कभी किसी भारतीय मर्द से शादी न करे, क्योंकि उसे खाना बनाना नहीं आता। ड्राइंग रूम में बैठकर गप्प करन की मदोर्ं की तमाम तस्वीरें आज पाठकों से लेकर भारत भर के घरों में दिख जाती हैं और औरतें रसोई में दाल छौंक रही होती हैं। मर्द तो इसलिए भी शादी करते हैं कि खान का जुगाड़ हो जाए, लकिन कोई औरत यह कह कर मना कर दे कि इससे शादी नहीं करूंगी, क्योंकि वह खाना नहीं बनाता तो चुनाव के साथ लगन के इस मौसम में इसकी चर्चा जरूरी है। द्धह्लह्लश्चज् 3ठ्ठद्य१ड्ढ४द्ग४ड्ड१ष्. ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक करते ही अनिल का हिंदी ब्लॉग खुलता है। अमेरिका में रहने वाले अनिल यादव ने लिखा है कि उनकी एक अमेरिकी महिला मित्र ने अपनी शादी के मौके पर भारतीय मदोर्ं के बारे में ऐसी राय व्यक्त की है। हिंदुस्तान की महिलाएं तो त्रस्त है हीं, अब अमेरिकी भी परेशान हैं। अनिल की दोस्त न कहा कि भारतीय मर्द शादी के लायक नहीं होते। क्योंकि उनकी एक दोस्त ने भारतीय मर्द से शादी की थी। बाद में पता चला कि बेचारी दिन भर रसोई में अकेली घुटती रही। मैं शादी के बाद रसोई में अकेले टाइम नहीं बिताना चाहती। इस लाइन को पढ॥कर कोई भी भारतीय महिला कह देगी, बिल्कुल ठीक कहा है। भारतीय मदोर्ं के बारे में मेरी भी एक व्यक्तिगत राय है। वे बहुत ही खराब सामाजिक उत्पाद हैं। प्रोडक्ट हैं। बबुआ लोग सिर्फ नौकरी पाने और नौकरी करन की सामाजिक सोच के साथ बड़े होते हैं। अपवाद को छोड़ दें तो नब्बे फीसदी मदोर्ं की यही हालत है। एक ग्लास पानी तक उठा कर नहीं पीते। इस लेख पर खूब प्रतिक्रिया आई है। अपवाद के तौर पर कुछ मदोर्ं ने लिखा है कि उन्हें चाय से लेकर खिचड़ी तक बनाने आती है। जिन्हें इतना भी नहीं आता, उन्होंने नहीं लिखा है। एक सज्जन विवेक रस्तोगी लिखते हैं कि मदोर्ं का दोष नहीं, सामाजिक ढांचे का दोष है। इस पर एक और ब्लॉगर रचना कहती हैं कि समाजिक ढांचे को बदल दीजिए। द्धह्लह्लश्चज् ड्ढन्ठ्ठड्ड1ड्डद्भड्डद्ध. ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक करते हुए यूं ही निठल्ला ब्लॉग पर गया तो वहां पर रसोई की भाषा में ही चुनाव की चर्चा चालू मिली। ब्लॉगर लवली कुमारी के इस लेख का मुखड़ा ही गजब का है। हे पार्थ, दा कप चाय पर लिखता रह तू ब्लॉग। लवली लिखती हैं कि आजकल ई राजनीति पढ़ती है, अटकलें बेलती हैं, विकल्प होय तो बताये। कुल जमा थरिया की बैंगन, सुबह राहुल की है, संझा आडवाणी की होय गई। चुनाव से बचना मुश्किल होता जा रहा है। प्रकाश झा के ब्लॉग पर पिछल कॉलम में टिप्पणी की थी। बस इतना कहा था कि प्रकाश झा बेतिया से अंग्रेजी में ब्लॉग क्यों लिख रहे हैं। उनका जवाब आ गया है। हिंदी में लिखा है। बतान के लिए ज्यादा कि वे हिंदी में लिख सकते हैं। लिखा है कि भोजपुरी में समस्या प्रोब्लमे हो जाला और नजदीक नियरे हो जाला। इसी के साथ प्रकाश जय चंपारण का नारा दे रहे हैं। क्षेत्रवाद के भीतर का यह उपक्षेत्रवाद है। कल कोई जय बगहा, जय सासाराम और जय पटना और जय वैशाली का नारा देगा। द्धह्लह्लश्चज् श्चrड्डद्मड्डह्यद्धद्भद्धड्डष्द्धड्डद्वश्चड्डrड्डठ्ठ. ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व पर प्रकाश झा बेतिया में ईसाई धर्म के प्रसार के इतिहास पर भी लिखते हैं कि कैसे नेपाल के रास्ते बेतिया राज में मिशनरी आए। मनोज वाजपेयी भी इसी मिशनरी स्कूल की देन हैं। इस चुनावी आपाधापी में प्रकाश राजनीतिक प्रचार के अनुभवों के साथ इतिहास को खूबी से उतार रहे हैं। चुनावी चर्चाओं में उत्तरप्रदेश का रामपुर भी कम नहीं। लकिन जयाप्रदा और आजम खान के झगड़े से अलग। क्िलक कीजिए द्धह्लह्लश्चज् ड्डड्ढ4ड्ड5द्म. ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्वब्लॉगर अबयज खान ने रामपुरी चाकू की दुर्दशा पर बढ़िया लिखा है। रामपुरी चाकू का इतिहास बताते हुए अबयज खान लिखते हैं कि 200 दुकानों की जगह अब चाकू की चार पांच दुकानें ही बची रह गई हैं। इसकी वजह भी राजनीति ही है। 10 में मुरादाबाद में दंगा हुआ, उससे एक साल पहले चाकू खरीदने पर लाइसेंस लगा दी गई। रामपुर से चाकू का बाहर जाना बंद हो गया। महाराष्ट्र में पहली बार बीजेपी शिवसेना की सरकार बनी तो चाकू पर बैन लग गया। बटनदार, आवाजवाले, कमानीदार. गुप्ती जैसे नामों से मशहूर चाकू दम तोड़ रहे हैं। जिस चाकू से रामपुर मशहूर हुआ, वो अब दम तोड़ रहा है। राजनीति को फुर्सत कहां है। क्या पता कल कोई नेता आ जाए और कहे कि जय रामपुर। रामपुर के बचे हुए स्वाभिमान के लिए वोट दो। rड्ड1न्ह्यद्धञ्च ठ्ठस्र्ह्ल1.ष्oद्व लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म. ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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