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बिहार : डूब रहा है तैरने वाला समाज

हिमालय से निकलने वाली नदियों में बाढ़ की शुरुआत नेपाल से होती है फिर वह उत्तर बिहार आती है। उसके बाद बंगाल जाती है। बाढ़ अतिथि नहीं है। यह कभी अचानक नहीं आती। दो-चार दिन का अंतर पड़ जाए तो बात अलग है। अन्यथा इसके आने की तिथियां बिल्कुल तय हैं। लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि मानो यह अचानक आई विपत्ति है। इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं। इसलिए अब बाढ़ की मारक क्षमता पहले से अधिक बढ़ चली है। पहले शायद हमारा समाज बिना इतने बड़े प्रशासन के या बिना इतने बड़े निकम्मे प्रशासन के अपना इंतजाम बखूबी करना जानता था। हाल ही में बिहार में आई प्रलयंकारी बाढ़ को लेकर सभी जगह बाढ़ से निपटने में हुई अव्यवस्था की चर्चा हुई है। अव्यवस्था के कई कारण भी गिनाए गए हैं- वहां की भयावह गरीबी आदि। लेकिन बहुत कम लोगों को इस बात का अंदाज होगा कि उत्तर बिहार एक बहुत ही संपन्न टुकड़ा रहा है इस प्रदेश का। वहां धान की ऐसी भी किस्में रही हैं जो बाढ़ के पानी के साथ-साथ खेलती हुई ऊपर उठती जाती थीं और फिर बाढ़ को बिदा कर खलिहान में आती थीं। बाढ़ आने पर सबसे पहला दोष तो हम नेपाल को देते हैं। यहां हिमालय की चोटियों पर जो पानी गिरता है उसे रोकने की उसके पास कोई क्षमता और साधन नहीं है और शायद उसे रोकने की कोई व्यावहारिक जरूरत भी नहीं है। यदि नेपाल पानी रोकेगा तो भी आज नहीं तो कल हमें अभी की बाढ़ से भी भयंकर बाढ़ को झेलने की तैयारी करके रखनी पड़ेगी। उत्तर बिहार की परिस्थिति भी अलग से समझने लायक है। यहां पर हिमालय से अनगिनत नदियां सीधे उतरती हैं और उनके उतरने का एक ही सरल उदाहरण दिया जा सकता है। जसे पाठशाला में टीन की फिसलपट्टी होती है उसी तरह से ये नदियां हिमालय से बर्फ की फिसलपट्टी से धड़ाधड़ नीचे उतरती हैं। उत्तर बिहार में हिमालय से उतरने वाली नदियों की संख्या अनंत है। आज लोग यह मानते हैं कि यहां पर इन नदियों ने दु:ख के अलावा कुछ नहीं दिया है। पर इनके नाम देखेंगे तो इनमें से किसी भी नदी के नाम में, विशेषण में दु:ख का कोई पर्यायवाची देखने को नहीं मिलेगा। लोगों ने नदियों को हमेशा की तरह देवियों के रूप में देखा है। एक तो इन नदियों का स्वभाव और ऊपर से पानी के साथ आने वाली साद के कारण ये अपना रास्ता बदलती रहती हैं। कोसी के बारे में कहा जाता है कि पिछले कुछ सौ साल में इसने 148 किलोमीटर के क्षेत्र में अपनी धारा बदली है। उत्तर बिहार के दो जिलों की इंच भर जमीन भी कोसी ने नहीं छोड़ी है जहां से वह बही न हो। ऐसी नदियों को हम किसी तरह के तटबंध या बांध से बांध सकते हैं, यह कल्पना भी करना अपने आप में विचित्र है। समाज ने इन नदियों को अभिशाप की तरह नहीं देखा। उसने इनके वरदान को कृतज्ञता से देखा। उसने यह माना कि इन नदियों ने हिमालय की कीमती मिट्टी इस क्षेत्र के दलदल में पटक कर बहुत बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन निकाली है। ये सारी चीजें हमें बताती हैं कि लोग इस पानी से इस बाढ़ से खेलना जानते थे। यहां का समाज इस बाढ़ में तैरना जानता था। इस बाढ़ में तरना भी जानता है। इस पूरे इलाके में हृद और चौरा या चौर दो शब्द बड़े तालाबों के लिए हैं। उन्नीसवीं शताब्दी तक वहां के बड़े-बड़े तालाबों के बड़े-बड़े किस्से चलते थे। चौर में भी बाढ़ का अतिरिक्त पानी रोक लिया जाता था। धीरे-धीरे बाद के नियोजकों के मन में यह आया कि इतनी जलराशि से भरे बड़े-बड़े तालाब बेकार की जगह घेरते हैं- इनका पानी सुख कर जमीन लोगों की खेती के लिए उपलब्ध करा दें। आज अंग्रेजी में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग शब्द है। इस तरह का पूरा ढांचा उत्तर बिहार के लोगों ने बनाया था। वह फ्लड वॉटर हारवेस्टिंग सिस्टम था। उसी से उन्होंने यह खेल खेला था। तब भी बाढ़ आती थी, लेकिन वे बाढ़ की मार को कम से कम करना जानते थे। तालाब का एक विशेषण यहां मिलता है नदिया ताल। मतलब है यह वर्षा के पानी से नहीं बल्कि नदी के पानी से भरता था। एक और बहुत बड़ी चीज पिछले दो एक सौ साल में हुई है। वे हैं- तटबंध और बांध। छोटे से लेकर बड़े बांध इस इलाके में बनाए गए हैं बगैर इन नदियों का स्वभाव समझे। नदियों की धारा इधर से उधर न भटके- यह मान कर हमने एक नए भटकाव के विकास की योजना अपनाई है जिसको तटबंध कहते हैं। आज पता चलता है कि इनसे बाढ़ रुकने के बजाय बढ़ी है, नुकसान ही ज्यादा हुआ है। बाढ़ अगले साल भी आएगी। पहले हमारा समाज इससे खेलना जानता था। लेकिन अब हम जसे-जसे ज्यादा विकसित होते जा रहे हैं। इसकी तिथियां और इसका स्वाभाव भूल रहे हैं। चार साल पहले भी बिहार में आई भयंकर बाढ़ के समय कहा गया था कि बाढ़ राहत में खाना बांटने में, खाने के पैकेट गिराने में हेलीकॉप्टर का जो इस्तेमाल किया गया, उसमें चौबीस करोड़ रुपए का खर्च आया था। शायद इस लागत से सिर्फ दो करोड़ रुपए की रोटी-सब्जी बांटी गई थी। ज्यादा अच्छा होता इसके बजाय हम कम से कम बीस हजार नावें तैयार रखते और मछुआरे, नाविकों, माहों को सम्मान के साथ इस काम में लगाते। यह नदियों की गोद में पला-बढ़ा समाज है। इसे बाढ़ भयानक नहीं दिखती। अपने घर की, परिवार की, सदस्य की तरह दिखती है। भविष्य में इस तरह की योजना बन सकती है। पुराने अनुभव को देखते हुए उनको सबसे पहले कहां-कहां अनाज या बना बनाया खाना पहुंचाना है इसकी तैयारी हो। तब हम पाएंगे कि शायद यह काम एक या दो करोड़ में कर सकेंगे और इस राशि की एक-एक पाई उन लोगों तक जाएगी जिन तक बाढ़ के दिनों में उसे जाना चाहिए। लेकिन हमें कुछ विशेष करके दिखाना है तो हम लोगों को नेपाल, बिहार, बंगाल और बांग्लादेश सभी को मिलकर बात करनी होगी। पुरानी स्मृतियों में बाढ़ से निपटने के क्या तरीके थे उनका फिर से आदान-प्रदान करना होगा। उन्हें समझना होगा और उन्हें नई व्यवस्था में हम किस तरह से ज्यों का त्यों या कुछ सुधार कर अपना सकते हैं।ड्ढr

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