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अनंत यात्रा

ल अनंत चतुर्दशी है। कल गणपति बप्पा चले जाएंगे। पिछले दस दिनों से वह हमार साथ थे। यही दिन है जब बप्पा का विसर्जन होता है। अब उन्हें भी जाना होगा। वह तो प्रभु हैं फिर भी। हम उनकी प्रतिमा स्थापित करते हैं। अगर उसकी स्थापना हमने की है, तो उसका विसर्जन भी करना होगा। प्रतिमा तो देह ही होती है न। देह को हम रख नहीं सकते। असल में जो भी पार्थिव देह में आया है, उसे जाना होता है। वह चाहे कोई भी हो। हमें ही नहीं, प्रभु को भी जाना होता है। हर दैहिक चीज का अंत है। हम जब तक देह में रहते हैं, तब तक अंत से छुटकारा नहीं है। प्रभु तक को उससे छूट नहीं है। आखिर राम, कृष्ण और बुद्ध को अपना शरीर छोड़ना पड़ा था न। अब जिस दिन विसर्जन होता है, वह है अनंत चतुर्दशी। विसर्जन और अनंत में कोई रिश्ता है क्या? आमतौर पर हम मनुष्य की अंतिम यात्रा को अनंत की यात्रा भी कहते हैं। यानी देह के अंत से अनंत की शुरुआत जुड़ी हुई है। स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा। हम अपनी देह से ऊपर हुए बिना अनंत की ओर नहीं जा सकते। उसके लिए हमें अपनी देह से अलग सोचना पड़ता है। अपनी देह के दायर में सोचने के मायने हैं कि हम सिर्फ अपने बार में ही सोच रहे हैं। देह से ऊपर होने के मायने हैं अपने सीमित-सिकुड़े दायर से बाहर आना। देह तो होती ही सीमित है। और जो भी सीमाओं में होता है उसका अंत होता ही है। हम जब अपनी देह से पर होने लगते हैं, तो अपनी सीमाओं को पार करने लगते हैं। अनंत की राह पर चलने लगते हैं। हम गणपति की देह का विसर्जन करते हैं। उस देह का अंत कर हम उनके अनंत को अपने साथ ले आते हैं। यह अनंत ही आत्मा है। हम गणपति की आत्मा को अपने भीतर बसाते हैं। यह प्रार्थना करते हुए कि हे प्रभु, हमें भी अपनी अनंत यात्रा का राही बनाओ।

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