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आतंकियों पर नकेल में तंत्र नाकाम

देश के बड़े हिस्सों में पिछले साल नवंबर से ही हत्याओं और आतंक के तांडव के साथ इंडियन मुजाहिदीन के नाम से सक्रिय आतंकी संगठन के नेटवर्क की पहचान करने और उसे ध्वस्त करने के नाम पर खुफिया एजेंसियां और पुलिस लगातार अंधेर में तीर चला रही हैं, लेकिन अभी तक उसे जरा भी सफलता नहीं मिली है। हालांकि अबतक हुई गिरफ्तारियों में अधिकांश सिमी के संदिग्ध लोग पकड़े गए हैं लेकिन, इससे भी आतंक की लहर थमी नहीं है। आंतकवाद को रोकने में नाकामी का मुख्य कारण आतंकवाद निरोधी क्षमता में सुधार लाने के लिए खुफिया एजेंसियों और पुलिस को अधिकार देने में हमारी उदासीनता हो सकती है। इसके साथ ही राजनीतिक इच्छाशक्ित की कमी और वोट बैंक की राजनीति भी है जो इस कैंसर से निपटने में पुलिस के पांव रोकती हैं। विभिन्न स्तरों पर सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी और जीवन व संपत्ति की रक्षा के लिए राजनीतिक व प्रोफेशनल नेतृत्व द्वारा अपनी मूलभूत जिम्मेदारी न निभा पाने पर उनपर जनमत का दबाव न बन पाने से भी समस्या जस की तस बनी हुई है। इसके अलावा आतंक रोधी मशीनरी की कमियों और खामियों पर नजर रखने के लिए भी कोई प्रतिबद्ध टास्कफोर्स हमार पास नहीं है। आज के आतंकवाद की बढ़ती तकनीकी क्षमताओं का मुकाबला करने की क्षमता हमारी खुफिया एजेंसियों के पास नहीं है। आतंकवाद पर राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की संयुक्त खुफिया समिति की आकलन क्षमता बहुत ही कमजोर है। 2001 में रॉ के पूर्व प्रमुख जी.सी. सक्सेना के नेतृत्व में बनी विशेष टास्क फोर्स ने एजेंसियों के बीच समन्वय और फॉलोअप मशीनरी गठित करने का सुझाव दिया था। यह विचार विभिन्न एजेंसियों के बीच पनपे अहम और प्रतिद्वंद्विता के कारण अबतक परवान नहीं चढ़ सका है। क्या किया जाए, इसपर अबतक राजनीतिक स्तर पर इच्छाशक्ित का बिल्कुल अभाव है। गठबंधन सरकारों के लंबे दौर में दलीय वैचारिकता की स्थिति बदतर ही होती गई है। आतंकवाद के विरोध में संसद ने कभी संतुलित और पूरी जानकारी के साथ बहस नहीं की है। हालांकि इस बात को लेकर समझ बनी है कि पोटा को बहाल करने के प्रति प्रधानमंत्री बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं। लेकिन उसी समय इस बारे में विपक्ष के साथ सरकार की लंबी बातचीत के बाद भी कोई कोई एका कायम नहीं हो सकी है कि पोटा को बहाल किए बिना कैसे पुलिस को सशक्त किया जा सकता है। इस समय इंडियन मुजाहिदीन और माओवादियों से निपटने के लिए एक संघीय जांच एजेंसी की सख्त जरूरत है लेकिन प्रधानमंत्री अबतक इस बार में विभिन्न दलों और राज्य सरकारों के साथ एकराय कायम नहीं कर सके हैं। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे आतंकवाद से लड़ने के मुद्दे पर राष्ट्रीय आमराय कायम करं। नहीं तो हम खून की होली खेलते रहेंगे। विदेशी निवेशकों के मन में भी ऐसे माहौल में भारत में निवेश करने में संदेह पैदा होता है।

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  • Web Title: आतंकियों पर नकेल में तंत्र नाकाम