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टीबी का अचूक इलाज

टीबी थम नहीं रही। कारण पुरानी दवाएं बेअसर हो रही हैं और इसका बैक्टरिया माइकोबैक्िट्रयम टुबरकुलोसिस पहले से ज्यादा शक्ितशाली हो गया है। टीबी गरीब और विकासशील देशों के गरीबों की बीमारी है इसलिए दवा खोजने के मोर्चे पर भी ठोस प्रयास नहीं हो रहे। बड़ी फार्मा कंपनियां टीबी पर शोध करने से कतरा रही हैं। वैज्ञानिक एवं औद्यौगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने अनूठी पहल की है। ओपन सोर्स ड्रग डिस्कवरी (ओएसडीडी) फोरम के जरिए उसने देश-दुनिया के उन तमाम वैज्ञानिकों को मंच प्रदान किया है जो गरीबों की इस बीमारी के निदान के लिए नई दवा खोज करना चाहते हैं। विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने सोमवार को फोरम की वेबसाइट ओएसडीडी.डाट नेट को लांच किया। उन्होंने बताया कि पहले फेज में टीबी की प्रभावी दवा खोजी जाएगी। फिर दूसरी उपेक्षित बीमारियों मसलन मलेरिया, डेंगू, तथा अन्य संक्रामक बीमारियों का इलाज ढूंढा जाएगा। वेबसाइट पर कोई भी शोधकर्ता खुद को रजिस्टर कर फोरम का हिस्सा बन सकता है। यहां टीबी संबंधी अब तक हुए शोधों, चल रहे शोधों समेत तमाम जरूरी जानकारियां मिलेगी। साइट के जरिये ही वे अन्य पंजीकृत सदस्यों के साथ शोध संबंधी जानकारी का आदान-प्रदान कर सकेंगे। मकसद यह है कि यदि कोई दवा बनती है तो वह आम लोगों तक कम दाम में पहुंच सके। सीएसआईआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी के अनुसार नई दवा की खोज होने पर ट्रायल का खर्च सीएसआईआर वहन करगा। इसके लिए कई सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों तथा दवा कंपनियों से मदद के लिए समझौते किए हैं। ग्लोबल रिसर्च एलाएंस भी इसमें शामिल है जिसके सदस्य बिल एवं मिरांडा गेट्स फाउंडेशन और वेल्कम ट्रस्ट जैसी बड़ी संस्थाएं हैं। वैज्ञानिक, शोधकर्ता, विशेषज्ञ, स्टुडेंट यहां तक की परंपरागत वैद्य भी फोरम का हिस्सा बन सकते हैं।

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