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ऐसा भी हो रहा है:सब्सिडी भारत की,फायदा नेपाल को

उत्तर प्रदेश नेपाल सीमा से 10 किलोमीटर भीतर तक उर्वरकों की एजेन्सी देने पर सरकार ने प्रतिबन्ध लगा रखा है। मगर 11 वें किलोमीटर पर खाद की सैकड़ों दुकानें खुल गईं। पड़ताल की गई तो पता चला कि रोजाना 60 लाख रुपए से यादा की सब्सिडी की खाद नेपाली बाजार में पहुँच रही है। यह खाद ट्रकों या अन्य मोटर वाहनों से नहीं साइकिल से जा रही है। इसके लिए भी पाँच-छह सौ साइकिलों का इस्तेमाल हो रहा है।ड्ढr ऐसा नहीं कि सीमा पर तैनात विभिन्न महकमे इससे अनभिज्ञ हैं। उनकी ही मिलीभगत से हो रहा है यह सब। भारत सरकार को अरबों रुपए की चपत तो लग रही है। मामला इतना संवेदनशील है कि कोई भी जिम्मेदार अफसर इसमें सामने आकर कुछ भी कहने से कतरा रहा है। खाद की तस्करी न हो इसके लिए राय सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से दस किलोमीटर तक खाद का लाइसेन्स देने पर प्रतिबन्ध लगा रखा है। सीमा से 11 वें किलोमीटर पर ही खुली सैकड़ों दुकानें हैं। इनकी आड़ में सुनियोजित तरीके से दिन-रात हजारों टन उर्वरकों की तस्करी हो रही है। यह भी पता चला है कि इस समय डीएपी की तस्करी प्रमुखता से हो रही है। पड़ोसी देश से चार खेप अर्थात सुबह, दोपहर, शाम और रात में पाँच से छह सौ साइकिलें सीमावर्ती जिलों में आती हैं। वापसी में प्रत्येक साइकिल पर दो बैग डीएपी लाद दी जाती है जो मुख्य रास्तों को छोड़कर खेत-खलिहानों व जंगलों से होकर नेपाल सीमा में प्रवेश कर जाते हैं।ड्ढr खाद की तस्करी से होने वाले आर्थिक फायदे का हिसाब भी सम्बन्धित लोगों के बीच साफ-साफ है। इस समय एक बैग डीएपी का खुदरा मूल्य 474.40 पैसे है जबकि नेपाल में यह 760 रुपए में मिलता है। डीलर 535 से 550 रुपए के बीच तस्करों को देता है और तस्कर इस नेपाल में 650 से 660 रुपए के बीच बेचते हैं। कम्पनी के नुमाइन्दों को भी प्रतिबैग डीलर से 30 से 35 रुपए प्रतिबैग मिलता है। प्रदेश के अनेक इलाकों में इस समय जहाँ डीएपी, पोटाश और एसएसपी की कमी हो रही है पड़ोसी देश नेपाल मे यह भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। शीर्षस्थ अधिकारी कहते हैं कि यह सब सीमा सुरक्षा बल व सीमावर्ती जिलों के जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण हो रहा है।ड्ढr सीमावर्ती जिलों के जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सीमावर्ती क्षेत्र में खाद की दुकानों की लाइसेन्स निलम्बित कर अपनी या अपने नुमाइन्दों की निगरानी में खाद का वितरण कराएँगे। यह निर्देश आज भी लागू है परन्तु अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।ड्ढr

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