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आढ़तियों को धान का भुगतान चावल मिलने पर !

पिछले खरीद सत्र के हजारों मीट्रिक टन चावल की वसूली न होने से परशान खाद्य विभाग इस समस्या से स्थायी निजात पाने के लिए कुछ कड़े कदम उठा सकता है। इसके तहत जिन चावल मिलों पर सीएमआर (विभाग द्वारा मिलों को दिए जाने वाले धान से निकलने वाला चावल) बकाया है उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने पर विचार चल रहा है। जबकि इस साल की धान खरीद नीति में आढ़तियों को धान का भुगतान सीएमआर मिलने के बाद करने जैसी व्यवस्था किए जाने पर मंथन चल रहा है।ड्ढr विभागीय आँकड़ों के मुताबिक खाद्य विभाग समेत राय सरकार की अधिकांश खरीद एजेन्सियाँ चावल मिलों से अब तक सीएमआर की वसूली नहीं कर सकी है। जबकि नई खरीद शुरू होने में एक पखवारा ही बचा है। अगस्त माह के आँकड़ों के अनुसार विभागीय विपणन शाखा का ही चावल मिलों पर सात हजार से अधिक सीएमआर बाकी है। पीसीएफ का दो हजार 86, यूपी एसएस का दो हजार मीट्रिक टन, यूपीएसएफसी का 6मीट्रिक टन और नेफेड का 6मीट्रिक टन सीएमआर चावल अवशेष था। यह हाल तब है जबकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विभिन्न योजनाओं में वितरित होने के लिए राय सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में चावल उपलब्ध नहीं है। इन योजनाओं के लिए हर माह करीब सवा दो लाख टन चावल की जरूरत होती है।ड्ढr सीएमआर चावल की वसूली न होना गंभीर प्रकरण है। उम्मीद है कि जल्दी ही इसकी वसूली करा ली जाएगी। लेकिन मामले को गंभीरता से लेते हुए इस समस्या के स्थाई समाधान पर विचार किया जा रहा है। मिलों से चावल मिलने के बाद ही आढ़तियों को भुगतान किए जाने के मामले में एक पेंच यह बताया जा रहा है कि पंजाब के विपरीत यूपी में आढ़तियों और चावल मिल मालिकों में कोई अंतर नहीं है। अधिकांश उन्हीं लोगों के पास आढ़त या कमीशन एजेन्ट का लाइसेंस है जिनकी खुद या उनके किसी करीबी की चावल मिल है। पहले से व्यवस्था है कि धान की डिलीवरी मिलने के बाद अगर 20 दिन के अन्दर संबंधित मिल चावल बना कर नहीं देती है तो उसे होर्डिग चार्ज अदा करना पड़ता है। बहरहाल बेहतर परिणाम न मिलने के कारण खाद्य विभाग प्रस्तावित नई खरीद नीति में कठोर प्राविधान कराने की तैयारी कर रहा है। ड्ढr ं

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