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परमाणु करार और गैरपरमाणविक धमाके

देश की राजधानी एक बार फिर दहशतगर्द हमलों का शिकार हुई। इन धमाकों ने एक बार फिर यह बात दर्दनाक ढंग से उजागर की कि अमेरिकी छलावे में फंस कर परमाणविक शक्ितसंपन्न महाशक्ित बनन की बेबुनियाद महत्वाकांक्षा हमारे लिए कितनी घातक सिद्ध हो सकती है। अमेरिका से बतौर बख्शीश दिया जाने वाला परमाणविक करार पहले ही देश को बुरी तरह विभाजित कर चुका है और लंबे अर्से से आलाचक उसके परखचे उड़ाते रहे हैं। जाने क्यों हमारी सरकार बेहद नादानी और अदूरदर्शिता के साथ यह हठ पाले है कि अमेरिका के साथ सामरिक संबंधों को घनिष्ठ बनाने से देश आतंकवाद के विरुद्ध एक मजबूत कवच हासिल कर लेगा। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मोर्चा खोलन का ऐलान करने वाला अमेरिका भारत और अपने राष्ट्रीयहित को देखता है और भारत को इस संघर्ष में अपना महत्वपूर्ण सहयोगी बनान को उत्सुक है। अब तक यह भ्रम पूरी तरह टूट चुका है कि अमेरिका जम्मू-कश्मीर राज्य में घुसपैठिये अलगाववादियों से भारत को निजात दिलान के लिए पाकिस्तानी शासकों पर किसी भी तरह का चाबुक फटकारेगा। कोरी लफ्फाजी के अलावा उसने से आज तक कुछ नहीं किया है। हां अमेरिका इस बात में जरूर सफल हुआ है कि भारत को उसने बार-बार उदीयमान शक्ित, सूचना क्रांति के जगत में महाशक्ित आदि नामों से पुकार कर एक मृग-मरीचिका में फंसा डाला है। परमाणविक करार इसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। यह बात समझाई जाती रही है कि कम स कम परमाणविक प्रसार के मामले में अमेरिका भारत और पाकिस्तान के बीच फर्क करता और भारत को जिम्मेदार देश मानता है। अब अपने समर्थन और सहायता की एवज में अगर यह नया-नवेला दोस्त यह मांग करता है कि हमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसी के सुझाए रास्ते पर चलना है तो इसमें आखिर क्या बुराई है? अभूतपूर्व खुशहाली की तलाश में ललचाया भारत यह बात आंख मूंद कर स्वीकार चुका है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसका उदय बिना अमेरिकी सहमति के नहीं हो सकता और आर्थिक विकास के लिए भी यह जरूरी है कि अमेरिकी पूंजीवादी नुस्खों को कड़वी नहीं मीठी दवाई समझकर गटक लिया जाए। हमारी समझ में अब तक विश्वव्यापार संगठन वाली व्यवस्था, आर्थिक सुधारों और भूमंडलीकरण की कलई भी अच्छी तरह खुल चुकी है। कुछ ही महीनों में जब देश में आम चुनाव संपन्न हो रहे होंगे, तब सभी राजनीतिक दलों को झकमार कर भूमंडलीकरण के, आर्थिक सुधारों के मानवीय चेहरे की बात एक बार फिर स करने के लिए झकमारकर मजबूर होना पड़ेगा। पिछले हफ्ते अमेरिका में एक ऐसा वित्तीय धमाका हुआ है, जिससे उत्पन्न ‘प्रदूषण’ परमाणविक हथियारों के रेडियोधर्मी के किरण स कहीं अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है। अमेरिका के एक मशहूर डेढ़ सौ साल पुराने विनिवेश में विशेषज्ञ बैंक लीमन ब्रदर्स ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में हड़कंप मच गया है। एक दूसरे बड़े बैंक मेरिल लिंच को बैंक ऑफ अमेरिका ने औने-पौने दाम पर खरीद लिया है। दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कंपनी अमेरिकन इंश्योरेंस ग्रुप इतनी खस्ता हाल हो चुकी है कि उसकी जान बचान के लिए न्यूयॉर्क के गवर्नर न कई खरब डॉलर अपने सरकारी खजाने से निकालकर उसे देन का फैसला किया है। अनेक ऐसे मशहूर और प्रतिष्ठित अमेरिकी बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थाएं भी हैं, जिनकी हालत इससे भी बदतर है। अमेरिकी सरकार और केंद्रीय बैंक यह ऐलान करन को मजबूर बने हैं कि इन सभी की प्राणरक्षक मदद करना उसके लिए संभव नहीं होगा। इसके पहले भी अमेरिकी वित्तीय संस्थाओं बैंकों और निष्पक्ष निर्भय समझे जाने वाले लेखा परीक्षकों का आचरण शक के दायरे में रहा है। आर्थर इंडरसन नामक कंपनी की पोल खुलन के बाद कोई बवकूफ व्यक्ित ही इन संस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय मानक या अनुकरणीय समझ सकता है। अगर बात अमेरिकी वित्तीय प्रणाली में लगे घुन या कैंसर की होती तो हम सरदर्द न पालते। दुर्भाग्य का विषय यह है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में और अमेरिका का अंधानुकरण करन की उतावली में हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था उद्योग और उद्यमी अमेरिकी वित्तीय संस्थाओं के भारत में निवेश के कारण अमेरिका में हुए विस्फोट से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। पहले ही झटके में मुंबई स्टॉक एक्सेंज कोई पांच सौं प्वांइट लुढ॥क गया। आगे-आगे देखिए होता है क्या? फिलहाल इस बात का जिक्र दबी जुबान से भी नहीं किया जा रहा है कि लेहमन बर्दस या मेरिल लिंच ने कितने बड़े पैमाने पर भारत के उन प्रतिष्ठित कारोबारियों के धंधें में पूंजी लगाई थी, जिन्हें 21वीं सदी में हिन्दुस्तान की बुलंदी का पर्याय समझा जाता है- इनफोसिस, विप्रो, एयरटेल और टाटा। कुछ वर्ष पहले इसी तरह का घातक ‘पिघलना’ तब भी देखन को मिला था, जब अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से रिश्तेदारी के कारण पूर्वी एशिया के तेज-तर्रार बघेरे पलक झपकते मिमयाती बिल्ली में बदल गए थे। तब सुझाया गया था कि अगर अमेरिका को जुकाम लगता है और छींक भी आती है तो पिछलग्गुए छुटभैए निमोनिया की चपेट में लोट जाते हैं। आज की हालत यह है कि अमेरिका वित्त व्यवस्था जुकाम से नहीं एड्स जैसी छूत की महामारी से ग्रस्त नजर आती है। जिस तरह एड्स का संक्रमण गैरजिम्मेदार व्यभिचार और नशाखोरी के कारण दानवी दैत्याकार रूप धारण कर सका था, उसी तरह मौजूदा वित्तीय संकट अमेरिका के निपट गैरजिम्मेदारों ने, असमाजिक-आत्मकेंद्रित, भोग-विलासी जीवनशैली और सरकार के अहंकारी लापरवाही के कारण ही इतना संघातिक बन सका है। काफी समय से समझदार लोग (अल्पसंख्यक अमेरिकियों समेत) यह बात कहते रहे हैं कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में सबप्राईम संकट विकट रूप लेता जा रहा है और यदि इसकी अनदेखी की गई तो उसका अंजाम बहुत बुरा होगा। अमेरिकी उपभोक्ता हो या सरकार, उसका अंदाज कर्ज की मय पी कर सुख भोगन का बना रहता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के आय-व्यय के खाते पर सरसरी निगाह डालते ही यह बात जगजाहिर हो जाती है कि अमेरिका कितनी बुरी तरह हजारों खरब डॉलर में डूबा है। जो लोग उसे सर्वशक्ितमान परमशक्ित महापुरुष समझते हैं अपना भाग्यविधाता, उन्हें याद दिलान की जरूरत है कि उसकी असलियत काग भगोड़े जैसी है। बांस की खपचियों पर लटका एक मटका जिसको इंसानों की जैसी पोशाक पहनाई जाती है। फसल चुगने वाली चिड़ियां भले ही इससे खौफ खाती हों कोई भी उद्दंड लड॥का लाठीभांज यह घड़ा कभी भी फोड़ सकता है। उत्तरी कोरिया तो जान कब से यह घटम बार-बार बजा रहा है। भारत न जाने क्यों इसे पराक्रमी राजनयिक समुद्र मंथन से निकला अमृत कलश समझ रहा है। लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।

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