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सब्र का पर्व

इंसान की जिंदगी में सबसे जरूरी आवश्यकताओं में से एक है ‘पेट की भूख’। भोजन की अहमियत बस इतनी है कि यह इंसानी जिंदगी को सुरुचिपूर्ण रूप से बाकी रखता है। भूख की समस्या का समाधान हो जाने पर शरीर की दूसरी महत्वपूर्ण बुनियादी आवश्यकता है ‘यौन इच्छाओं की संतुष्टि’। इसी पर मानव जाति की निरंतरता निर्भर करती है। इन दोनों बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति उचित, न्यायसंगत, सामाजिक, शांतिपूर्ण, सुन्दर और सभ्य तरीके से होनी चाहिए। एक शब्द में ‘नैतिकतापूर्ण’ होनी चाहिए। दुनिया में जितनी भी अव्यवस्था आज है, इन्हीं दो बुनियादी आवश्यकताओं को लेकर है। रिश्वत, चोरी, लड़ाई-झगड़े, अंग-प्रदर्शन, संगीत और सिनेमा के नाम पर असभ्यतापूर्ण उठा-पटक दरअसल इन्हीं दो आवश्यकताओं को अनुचित रूप से पूरा करन के प्रयास हैं। लकिन रमज़ान के रोज़े व्यक्ित को बाध्य कर देते हैं कि इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति अल्लाह के हुक्म के मुताबिक करे और उसका हुक्म सदा नैतिक होता है। एक महीने सुबह से शाम तक यानी रोज़े के दौरान खाने-पीने और काम संतुष्टि से रुके रहना इस बात का सबूत है कि नैतिकता खुदा के आदेशों से संचालित होती है, जबकि जायज़ तरीके से इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति इंसान का हक है, लकिन सिर्फ और सिर्फ अपने रब से मुहब्बत व डर की वजह से इंसान इनसे परहेज करता है। परहेज व सब्र का यही कारनामा रमज़ान के महीने में जिंदगी के हर क्षेत्र में देखन को मिलता है। रोजों से यह संकेत मिलता है कि खुदा का खौफ और प्रेम ही है, जो इंसान को अंतिम सीमा तक नियंत्रित कर सकता है। समाज की नज़रों से परे बंद कमरे में सामाजिक दबाव तो शून्य हो जाता है। लकिन एक रोजेदार वहां भी संयम बरतता है। कोई रोज़ेदार बंद कमरों में भी कोई अनुचित हरकत नहीं करता, उसे विश्वास होता है कि उनका रब यानी खुदा उन्हे निरंतर देख रहा है।

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