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खुलने लगे ‘कोसी प्रलय’ के राज

ोसी प्रलय आने के राज अब धीर-धीर खुलने लगे हैं। गत चार वर्षो से भारत और नेपाल के बीच तटबंध समेत अंतरराष्ट्रीय मसलों पर सचिवस्तर की वार्ता बंद है। यही नही ंगंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग (जीएफसीसी) ने वर्ष 2004 के बाद कोई पर्यवेक्षण रिपोर्ट नहीं दी है। ऐसे में बिहार के साथ नेपाल से जुड़े तटबंधों के अलावा नेपाल की बिहार आने वाली नदियों से उत्पन्न संकट पर केन्द्र के स्तर पर कोई वार्ता ही नहीं हो सकी।ड्ढr ड्ढr हालांकि अब यह बाधा दूर हो गई है और दोनों देश सचिवस्तर की वार्ता फिर से शुरू करने और मानसून पूर्व और मानसून बाद की बैठक करने के साथ-साथ बाढ़ पूर्व चेतावनी देने पर सहमत हो गए हैं। ऐसे में बिहार के लिए उम्मीद की नई किरण जग गई है। जीएफसीसी बिहार के तटबंधों पर नजर रखने वाली सर्वोच्च तकनीकी संस्था है। वही तटबंधों का निरीक्षण भी करती है और उसकी मरम्मत आदि के लिए अपनी अनुशंसाएं देती हैं। यही नहीं उसकी अनुशंसाओं के आधार पर ही कार्ययोजना मंजूर होती है और उसी आधार पर केन्द्र राशि भी देता है। जल संसाधन विभाग के एक अधिकारी के अनुसार जीएफसीसी ने गत चार वर्षो से कोई निरीक्षण रिपोर्ट ही नहीं दी है, लिहाजा कई स्तर पर समन्वय का बेहद अभाव हो गया। उधर नेपाल के प्रधानमंत्री के दिल्ली दौरा के बाद यह राज खुला कि दोनों देशों के बीच सचिव स्तर की वार्ता पिछले चार वर्षो से बंद है। इसका सबसे भारी खामियाजा बिहार को उठाना पड़ा है। नेपाल से बिहार की समस्याएं सीधी जुड़ी हैं। नेपाल से लगभग 300 स्रेतों से पानी बिहार में प्रवेश करता है। ऐसे में उनपर नेपाल के माध्यम से ही नजर रखी जा सकती है। बिहार की बाढ़ समस्या के हर पहलू पर सचिवस्तर की वार्ता में ही विचार-विमर्श होता है और वहीं उसका निदान निकाला जाता है।ं

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