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देर आयद ..

तकनीक के बदलाव ने इसे निर्थक बना दिया था। जब आप इंटरनेट पर दुनिया का कोई भी अखबार, किसी भी देश की कोई भी पत्रिका पढ़ सकते हो तो परंपरागत विदेशी समाचार पत्रिकाओं को छापने देने पर रोक का अब कोई मतलब नहीं रह गया था। जब हर रो एक नई खिड़की खुल रही हो तो पुराने चिलमन को ताने रहने में कोई बुद्धिमानी नहीं। कंपनी का कानून का वह प्रावधान जो भारत में विदेशी समाचार पत्रिकाओं के प्रकाशन और उन्हें छापने पर रोक लगाता है, वह 1में बना था। मुमकिन है कि तब इस कानून का कोई महत्व रहा हो। महत्व न भी हो तो भी तब यह ऐसा कानून था जिसके जरिये आप देश के लोगों को विदेशी पत्रिकाओं से दूर रख सकते थे, पर अब नहीं रख सकते। सूचना तकनीक के जरिये अब वे कहीं भी कभी भी पहुंच सकती हैं। और ऐसा भी नहीं है कि विदेशी समाचार पत्रिकाएं हमारे तक पहुंच ही नहीं रही थीं। वह हमार पास लगातार पहुंचती रहीं, लेकिन विदेश में छपकर और प्रकाशित होकर। वे महंगी तो पड़ती ही थीं। साथ ही हम एक ऐसी चीज पर विदेशी मुद्रा खर्च कर रहे थे जिसे हम आसानी से अपने यहां तैयार कर सकते थे। सारी तकनीक, कच्चा माल और कुशलता मौजूद थी। बस एक 52 साल पुराना कानून था जो हमें रोक रहा था। यह भी सच है कि बहुत-सी विदेशी पत्रिकाएं भारतीय बाजार में पांव पसारने को आतुर हैं। भारत से प्रकाशन शुरू करने के कई विदेशी प्रस्ताव विभिन्न मंत्रालयों में अटके हुए हैं। पूरी दुनिया में पत्र-पत्रिकाओं का बाजार सिमट रहा है। भारत उन चंद देशों में है, जहां संभावनाएं बची हुई हैं। इसी बाजार और इसकी संभावनाओं के बल पर भारत मीडिया व्यवसाय का एक बड़ा केंद्र भी बन रहा है। इसलिए 26 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी के साथ विदेशी समाचार पत्रिकाओं के भारत में प्रकाशन के फैसले के साथ ही जो रास्ता खोला गया है, उस पर अब और आगे बढ़ने की जरूरत है। अभी भी बहुत-सी बाधाएं हैं जो खबरों और विचारों के मुक्त प्रवाह को रोके खड़ी हैं। हमार नीति-नियामक एफएम और रडियो पर खबरों के प्रसारण की क्षाजत निजी क्षेत्र को देने को अभी भी तैयार नहीं हैं। अभी भी वे इस क्षेत्र में उस आकाशवाणी का नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं, जो सरकार के प्रचार तंत्र से ज्यादा कुछ भी नहीं है।

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