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एक संधि की गांठें हचाार

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल यानी प्रचंड की चार दिन की भारत यात्रा उसी मोड़ पर खत्म हुई जहां उम्मीद थी। ऐसा लगा जसे मेहमान और मेजबान दोनों की ही भूमिकाएं पहले ही लिख दी गई हों। कहा गया कि बातचीत सौहार्दपूर्ण और गर्मजोशी से भरी थी और दोनों देशों के रिश्ते बहुत खास हैं, लेकिन इस सार्वजनिक अभिनय के अलावा इस यात्रा में वे मापदंड तैयार हो गए जिसमें दोनों देश अपने रिश्तों को फिर से परिभाषित करंेगे। नेपाल की सत्ता में माओवादियों का आना ऐसी घटना थी जिसे भारत सरकार ने न तो चाहा था और न उसे इसकी उम्मीद ही थी। सरकारी अधिकारी अक्सर उस लाल गलियार का जिक्र करते थे जो नेपाल की सत्ता में माओवादियों के आने से बन सकता है। इस बात के भी सबूत हैं कि जब माओवादी नेपाल की शाही सेना के खिलाफ जंग लड़ रहे थे तो वे भारत को ही अपने छुपने के ठिकाने के तौर पर इस्तेमाल करते थे, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह बताता हो कि भारत और नेपाल के माओवादी मिल-ाुलकर कोई साझा ऑपरशन चला रहे थे। शक का कारण शायद यह भी था कि एक अज्ञात आजाद ताकत थी जो पिछली नेपाल सरकार की नीतियों को पलट देने के लिए प्रतिबद्ध थी। भारत की नेपाल नीति बरसों से वहां की राजशाही और बहुदलीय लोकतंत्र के दो खंभों पर ही टिकी थी। नई दिल्ली ने जब तक मुमकिन हुआ माओवादियों को नेपाल की राजनीति के गंभीर खिलाड़ी की मान्यता देने से ही इंकार किया, लेकिन जब शाह ज्ञानेंद्र से असहमतियां होने लगीं तो साउथ ब्लॉक ने नरश के बाद के नेपाल पर सोचना शुरू किया। लेकिन तब भी यह ध्यान रखा गया कि माओवादी पड़ोसी देश की बड़ी ताकत न बन पाएं। संविधान सभा के चुनाव में जब माओवादी सबसे बड़े दल के रूप में उभरे तब प्रचंड के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने में खासी खींचतान हुई और नेपाल में कई माओवादी मानते हैं कि इसके पीछे नई दिल्ली का ही हाथ था। वैसे भारत पड़ोसी देश की ऐसी घटानाओं को नेपाल का आंतरिक मामला नहीं मानता रहा है। नेपाल के नेता परंपरागत रूप से भारत में सलाह और दिशा-निर्देश के लिए आते रहे हैं। प्रचंड का अपनी पहली यात्रा के लिए भारत के बजाय चीन को चुनना उनकी एक चालाकी भरी सोची-समझी रणनीति थी। ऊपरी तौर पर तो यह ओलंपिक के समापन समारोह में शिरकत भर थी लेकिन यह चीन के हू जिंताओ, वान जिआबाओ जसे नेताओं से मुलाकात और आपसी हितों के मसलों पर बातचीत का एक मौका भी था। इस यात्रा से प्रचंड दो चीजें बता देना चाहते थे। चीन को यह कि वे काठमांडू के पिछले प्रधानमंत्रियों की तरह दिल्ली के इशारों पर चलने वाले नहीं हैं। दूसरे भारत को यह कि नेपाल के पास चीन जसा एक विकल्प मौजूद है। हालांकि भारत ने आधिकारिक तौर पर प्रचंड की चीन यात्रा पर कुछ नहीं कहा, लेकिन उनका संदेश साउथ ब्लॉक तक पहुंच गया था। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली यात्रा में बहुत ज्यादा देरी नहीं की। यहां वे सभी प्रमुख नेताओ ंसे मिले। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से भी, विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी से भी और विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी से भी। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी मुलाकात की और प्रकाश करात व सीताराम येचुरी जसे नेताओं से भी। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से तो वे मिले ही, साथ ही साथ ही उद्योग संगठनों के संयुक्त सत्र को भी संबोधित किया। प्रचंड का यह व्यवहार एक परिपक्व नेता का था जो यह जानता है कि नेपाल की सामाजिक- राजनैतिक स्थिरता और आर्थिक विकास में भारत की क्या भूमिका है। लेकिन इसी के साथ वे यह अहसास कराना भी नहीं भूले कि भारतीय नेताओं के सामने जो नेपाल है वह बदल चुका है और इस बदलाव को स्वीकार करके ही आगे बढ़ा जा सकता है। इसकी झलक यात्रा के अंत में जारी दोनों देशों के साझा बयान में भी मिली। बयान में यह भी कहा गया है कि दोनों प्रधानमंत्री 10 की भारत-नेपाल संधि की पुन: समीक्षा पर सहमत हो गए हैं। वैसे नेपाल की दूसरी पार्टियां भी इस संधि पर फिर से विचार की मांग कर रही हैं। 10 में जब काठमांडू में मनमोहन अधिकारी की सरकार बनी थी तो उसने भी यही मांग की थी, लेकिन भारत का तर्क था कि अगर इस संधि में कुछ रद्दोबदल की जाती है तो नेपाल का फायदा तो कम होगा नुकसान ज्यादा। बाद में अधिकारी सरकार भी इससे सहमत दिखी और उसने अपनी मांग वापस ले ली, लेकिन प्रचंड सरकार का मामला अलग है। उसे नेपाल की जनता को यह दिखाना है कि वह पहले की सरकारों से अलग है। वैसे माओवादी नेता यह मानते हैं कि 10 में जब यह संधि हुई थी तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है। अब यह तय हुआ है कि दोनों देशों के सचिव नई संधि के लिए एक समिति बनाएंगे। क्या बदलाव होंगे यह अभी स्पष्ट नहीं। माओवादियों की आपत्ति उस प्रावधान को लेकर है जिसमें नेपाल की सुरक्षा के मामले में भारत की राय को ज्यादा अहमियत दी गई है। संधि की ऐसी चीजें बदल सकती हैं, लेकिन इसके अलावा भी कई बिंदु हैं जहां भारत और नेपाल काम कर रहे हैं। चारों तरफ जमीन से घिर नेपाल को बाकी दुनिया से जुड़ने के लिए भारत की जरूरत है, लेकिन इसे कई और मामलों में भी भारत की जरूरत है। इनमें नदियों का मामला भी है। दोनों मिलकर जल विद्युत परियोजनाएं लगा सकते हैं जिसका फायदा दोनों को मिलेगा। फिलहाल तो वे कोसी नदी के टूटे तटबंध की मरम्मत कर सकते हैं। साझा बयान में कहा गया है कि दोनों देश रिश्तों के ‘विशिष्ट दज्रे’ का ध्यान रखेंगे। जब तक दोनों देश इस ‘विशिष्ट दज्रे’ पर सहमत रहते हैं तब तक ज्यादा समस्या खड़ी नहीं होगी। समस्या तब आएगी जब कोई देश इसे फिर से परिभाषित करना चाहेगा या उसमें कोई नई चीज जोड़ना चाहेगा। अपनी सरकार चलाने के लिए प्रचंड उन पार्टियों पर निर्भर हैं जिनके भारत से गहर संबध हैं। ये पार्टियां यही चाहेंगी कि नेपाल के भारत से रिश्ते बने रहें। बहुत कुछ आने वाले दिनों में नेपाल के रवैये पर निर्भर करगा। इस बात पर कि प्रचंड सरकार को किस तरह चलाते हैं, लेकिन प्रचंड को यह तो याद रखना ही होगा कि संधि पर फिर से बातचीत का अर्थ है कि आप कुछ चीजें हासिल करेंगे और कुछ खोएंगे भी। लेखक आईएएनएस में सामरिक और विदेशी मामलों के संपादक हैं।

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