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बुरा मानो या भला : किस कीमत पर आजादी

मैंने अभी तक किसी कश्मीरी मुसलमान को खुद को हिंदुस्तानी कहते नहीं सुना। उनके लिए तो बस ‘मैं कश्मीरी हूं।’ मेर ख्याल से इस मामले में कुछ अलग शेख अब्दुल्ला, उनके बेटे फारूक और पोते उमर रहे हैं। 1से ही जब भी हिंदुस्तान के मैच पाकिस्तान से हुए हैं, उन लोगों ने पाकिस्तान का ही साथ दिया है। अगर आपको मेरा भरोसा न हो, तो बशरत पीर की ‘कफ्यरूड नाइट’ पढ़ लो। उससे आपको कश्मीरी दिमाग को समझने का मौका मिलेगा। अब तो वहां के हालात सब देख सकते हैं। वे चाहते हैं कि हम हिंदुस्तानी ही घाटी से बाहर चले जाएं। पाकिस्तान फिलहाल खासा परशानी में है। हो सकता है कि वे उनसे मिलना न चाहें, लेकिन हिंदुस्तान से आजादी तो चाहते ही हैं। उस आजादी का क्या असर हो सकता है? उस पर अभी उनकी नजर नहीं जा रही। लालचौक पर जो नार और मुहावर इस्तेमाल हो रहे हैं, उनसे तो नहीं लगता कि वे उसके असर पर सोच रहे हैं। उनमें सभी अलगाववादी शामिल हैं मसलन मीरवाक्ष, गिलानी, यासीन मलिक और महबूबा मुफ्ती। दरअसल, आजादी का सबसे बड़ा असर तो कश्मीर से गैर-मुसलमानों की विदाई का होगा यानी कश्मीरी पंडित और सिख वहां से चले जाएंगे। उनके वादों पर मत जाना कि ऐसा नहीं होगा। एक छोटे स्तर पर ऐसा हो चुका है। कश्मीरी पंडितों ने बड़ी तादाद में घाटी को छोड़ दिया था। बंटवार के वक्त भी नेहरू और जिन्ना ने ऐसा ही भरोसा दिलाया था। लेकिन हुआ क्या? एक करोड़ लोगों को बेघरबार होना पड़ा था। दस लाख की हत्या हो गई थी। अब घाटी से जब भी हिंदू और सिखों का पलायन होगा, तो जम्मू से मुसलमानों को बाहर करने की बात भी उठेगी। संघ परिवार और बीजेपी यह मांग जरूर करगी। घाटी का सारा कारोबार और टूरिम हिंदुस्तान से ही है। अपने देश में शायद ही कोई होटल हो, जहां कश्मीरी शॉल, कालीन वगैरह न बिकती हों। हाारों कश्मीरी मुसलमान देशभर में काम करते हैं। आजादी की मांग से क्या उनका करियर चौपट नहीं होगा? हुर्रियत लीडर चाहे जो तस्वीर पेश करं, लेकिन हमें उसे नहीं होने देना है। हमार काबू से हालात तो 10 से बाहर होने लगे थे। बशरत पीर बताते हैं कि तब से हाारों कश्मीरी पाकिस्तान जाकर मिलिटरी ट्रेनिंग लेकर आए और तबाही मचाई। वहां के लोगों ने उन्हें खाना-पीना और रहने की जगह दी। हिंदुस्तान तो उस सिलसिले में यही कर सकता है कि और ज्यादा टुकड़ियां भेज दे। स्थानीय लोगों पर काबू रखें और आतंकवाद में लगे लोगों को मार दें। कब तक इस तरह सब चलता रहेगा? घाटी को आजादी तो दे देनी चाहिए, लेकिन उन्हें बता देना चाहिए कि स्वायत्तता सिर्फ अपने काम आजादी से करने के लिए है। हिंदुस्तान को मिलिटरी की मौजूदगी रखनी ही होगी ताकि घुसपैठियों से अपनी सीमा का बचाव किया जा सके, लेकिन किसी भी तरह इस बेहाली को रोकना चाहिए। शारदा प्रसाद मेर बाद उन्हें प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘योजना’ का संपादक बनाया गया था। वह मैसूर यूनिवर्सिटी के जुझारू नेता की इमेज के साथ आए थे। महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में वह जेल भी रह आए थे। प्रकाशन विभाग में दक्षिण भारतीय उन्हें बड़ी इज्जत के साथ देखते थे। उन लोगों को भरोसा था कि वे आनेवाले वक्त में बहुत आगे जाएंगे। उनकी बीवी बेहद खूबसूरत थीं। हम सबको उससे जलन होती थी, लेकिन जो भी आग उनमें अपने लड़कपन में थी, उसे नौकरी ने मार दिया था। उन्होंने अपनी भीतरी भावनाओं को कभी छिपाया भी नहीं। वह बमुश्किल मुस्कराते थे। मैंने उन्हें कभी हंसते हुए नहीं देखा। एक अनुभवी नौकरशाह की मिसाल जसे थे वह। उनकी बाद की जिंदगी में मैं उनसे कई बार टकराया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें प्रेस सलाहकार बना लिया था। मैं जब भी श्रीमती गांधी से मिलने साउथ ब्लॉक जाता था, तो वही मुझे उनके कमर तक ले जाते थे। वह इंटरव्यू पूरा होने तक वहीं बने रहते थे। लेकिन बिना एक लफ्ज बोले। वह नोट्स लेते थे और फिर छोड़ने बाहर आ जाते थे। राजीव गांधी के दौर में भी ऐसा ही था। उन्होंने सालों इंदिरा परिवार को राज करते देखा था। इंदिरा और राजीव को हल्का-फुल्का जानने वालों ने किताबें लिख डालीं, पर शारदा ने कुछ नहीं लिखा। हालांकि कई किताबें उन्होंने लिखीं। रिटायर होने के बाद शारदा प्रसाद ने ‘एशियन एज’ में लगातार लिखा। अलग-अलग विषयों पर वे बेहतर लेख लिखते थे। एक लेख में उन्होंने मुझे सबसे ज्यादा उम्र का टीनएजर लिखा था। कुछ वक्त से वह बीमार थे। मेरी बेटी उनसे मिलने गई थी। उसका कहना था कि वह ज्यादा दिन नहीं रहेंगे। सचमुच, वह नहीं रहे।

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