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चानेटिक कारणों से होती है वात, कफव पित प्रवृत्ति

आयुव्रेद में वर्णित रोगी की वात, कफ और पित प्रकृति के लिए जीन जिम्मेदार हैं। जीन अनुसंधान परियोजना पर कार्य कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान के बाद यह नतीजा निकाला है। मतलब यह कि आयुव्रेद में चार हजार साल पहले गहन अनुभव के आधार पर शरीर की जो प्रकृतियां दर्ज हो चुकी हैं, उनका वैज्ञानिक आज जेनेटिक कारण बताने में सक्षम हैं। सीएसआईआर के महानिदेशक समीर के. ब्रह्मचारी ने हताया कि उक्त अध्ययन में भारत में इंडो-यूरोपीयन समुदाय के वात प्रकृति के 3पित के 2तथा कफ के 28 लोगों के रक्त नमूने लेकर जेनेटिक प्रोफाइल जांच की गई। आयुव्रेद के अनुसार वात की बहुलता न्यूरोलॉजिकल डिस आर्डर, पित की मेटाबालिज्म से संबद्ध बीमारियों और कफ की दिल से जुड़ी बीमारियों के लिए जिम्मेदार है। जेनेटिक प्रोफाइल जांच में इसकी पुष्टि हुई है। इंसान के 0 हजार जीनों की जांच से स्पष्ट हुआ है कि वात प्रकृति के व्यक्ित में न्यूरोलॉजिकल बीमारियों या ऐज रिलेटिड बीमारियों वाले जीन कहीं ज्यादा सक्रिय हैं। कफ प्रकृति में दिल की बीमारियों और पित्त में रक्त से जुड़ी बीमारियों के जीन ज्यादा सक्रिय हैं। इन तथ्यों की दोहरी पुष्टि की गई। मसलन कफ प्रकृति के व्यक्ित में ऐज रिलेटिड या न्यूरोलॉजिकल डिसआर्ड बढ़ाने वाले जीन कम सक्रिय दिखे। इन नतीजों से उत्साहित सीएसआईआर अब आयुर्जिनोमिक्स की तह तक जाने का फैसला कर चुका है। अब ज्यादा सैंपल साइज और दूसर मानव समूहों पर यह शोध आगे बढ़ेगा। आयुव्रेदाचार्य विविध प्रकृतियों के आधार पर अलग अलग औषधियां देते आये हैं। आधुनिक दवाएं भी हर मरीा पर एक जसा असर नहीं करती। आधुनिक मेडीसिन की यह नई चुनौती है। जिनोमिक अध्ययनों के आधार पर भविष्य में आधुनिक दवाएं व्यक्ित की अलग अलग प्रकृति के अनुसार बना करंगी। व्यक्ित की प्रकृति की जांच नब्ज देखकर या शारीरिक संरचना से नहीं, जेनेटिक टेस्टिंग से हुआ करगी। ‘जर्नल ऑफ ट्रांसलेशन मेडिसिन’ के ताजे अंक में प्रकाशित समीर ब्रह्मचारी और जिनोमिक्स एवं इंट्रीग्रेटिव बायोलॉजी की मिताली मुखर्जी के शोध पत्र में यह खुलासे किये गये हैं। दो अन्य वैज्ञानिक डा. भावना परासर और सपना नेगी भी इसमें शामिल हैं।

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  • Web Title: चानेटिक कारणों से होती है वात, कफ व पित प्रवृत्ति