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धर्म

‘चलम् चित्तम्, चलम् वित्तम्, चलत जीवन यौवनम्।ड्ढr चला चले ही संसारे, धर्म एको हि निश्चल॥’ संसार में सब कुछ चलाएमान है। पर मनुष्य का मन सबसे अधिक चंचल है। इसकी गति प्रकाश से भी अधिक है। धन की यही स्थिति है। कहा जाता है- ‘लक्ष्मी चंचला होती हैं।’ कभी एक हाथ, एक घर में नहीं ठहरतीं। इसलिए आज के एक धनवान को हम कल ही निर्धन होते देखते हैं। चित्त और वित्त ही क्यों जीवन और यौवन भी चलायमान है। एहसास होन के पूर्व बीत जाता है। परंतु धर्म स्थायी है। निश्चल है। समय के साथ इसके अर्थ भी नहीं बदलते। धर्म ही कत्तर्व्य है। मानव जीवन का साधन है। साध्य भी। ‘धर्मो रक्षति, रक्षित:।’ धर्म उसकी रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है। एक व्यक्ित के कई धर्म होते हैं। समाज में विभिन्न संबंधों और दायित्वों को निभाता मनुष्य विभिन्न धर्मों (कत्तर्व्यों) का पालन करता है। इसलिए अन्य जीवों से भिन्न है। सभी जीव आहार, निद्रा, भय और मैथुन के लिए प्रयासरत हैं। मनुष्य अपने धर्म को लेकर ही उनसे इतर है। संतान धर्म, पति-पत्नी धर्म, माता-पिता धर्म और पड़ोसी धर्म से लेकर मानव धर्म। जीवन की विभिन्न स्थितियों में विभिन्न भूमिकाएं हमारा धर्म ही है। जब हम अपने धर्म के अनुकूल काम नहीं करते तो समाज में विसंगतियाँ आती हैं। हमारा एक धर्म मतदाता का धर्म भी है। देश के नागरिक होन के नाते नागरिक धर्म निभाते हुए चुनाव में मतदान करते समय सही दल और सही व्यक्ित को चुनना ही मतदाता के नीर-क्षीर विवेक शक्ित की परीक्षा है। मतदाता स्वयं तो अपने मत का सही उपयोग नहीं करते, पर राजनीति में गलत व्यक्ित के आन की निंदा करते नहीं अघाते। ‘स्व धर्मम् निधनम् श्रेयम्। पर धर्मो भयावह।’ अपने धर्म के रक्षार्थ जहां मृत्यु भी अंगीकृत की जाती हो। दूसरों का धर्म भयावह है ही। इसलिए अपने विवेक से मतदान करना धर्म निभाना ही है। मतदाता यदि अपना धर्म निभाता है तो गलत व्यक्ितयों के राजनैतिक प्रवेश पर भी रोक लगाता है।

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