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बाढ़ की तबाही देखनी हो तो मुरलीगंज जाइए

बाढ़ की तबाही का अगर कोई मूक गवाह है तो वह है- मुरलीगंज। एक माह बाद भी यहां का जर्रा-जर्रा इस तबाही की बानगी खुद व खुद बयां कर रहा है। कोसी ने धारा क्या बदली मुरलीगंज की तस्वीर और तकदीर ही बदल गयी। यहां कुछ नहीं बचा। अगर कुछ बचा है तो वह है-सन्नाटा। दूर-दूर तक फैले इस सन्नाटे को चीरने की कोशिश करती है बेंगा पुल के समीप कोसी की तेज धारा की कल-कल-छल-छल की ध्वनि। रत इतनी तेज कि मानो अब भी निगलना शेष बचा हो। दरअसल कोसी ने मुरलीगंज को अपने आगोश में ले लिया है। एक माह बाद भी यह क्षेत्र बिहार के मानचित्र से पूरी तरह अलग-थलग है। चारो ओर सिर्फ पानी ही पानी है। बीच में टापू बना है मुरलीगंज। रल व सड़क मार्ग पूरी तरह बंद है। वहां पहुंचने का एक मात्र साधन नाव है। लाइफ लाइन माना जाने वाला एन.एच.-107 मिरचाईबाड़ी (जानकीनगर) और मधेपुरा के बीच पूरी तरह क्षत-विक्षत है। जब यह संवाददाता नाव से और फिर काफी दूर तक पैदल जाने के बाद मुरलीगंज पहुंचा तो एक अजीब सी खामोशी थी। बंद दुकानें, गलियों और सड़कों पर फैले पानी और उससे निकल रही संड़ाध यह बताने के लिए काफी है कि गुलाबबाग के बाद दूसरी बड़ी मंडी के रूप में विकसित मुरलीगंज को उजाड़ने में कोसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। स्पेयर पार्ट्स के बिक्रता ललित चांडक कहते हैं कि हालात सामान्य होने में काफी वक्त लगेगा। तबतक व्यापारी बेमौत मर जायेंगे। कई व्यापारियों ने तो यहां से अन्यत्र जाने का मन भी बना लिया है। फर्टिलाइजर का कारोबार करने वाले वासुदेव अग्रवाल का मानना है कि व्यवसायी वर्गो को जो आर्थिक क्षति हुई है उसकी भरपाई नामुमकिन है। ललित या वासुदेव अकेले व्यवसायी नहीं हैं बल्कि दर्जनों व्यवसायी अपने करोड़ों का कारोबार छोड़ अन्यत्र शरण लिए हुए हैं।ं

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