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पाक-अफगान युद्ध हुआ तो ..

ाबुल स्थित ब्रिटिश दूतावास में हाल ही में एक पार्टी के दौरान किसी मेहमान ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच युद्ध की बात कही। इतना सुनकर मेज पर बैठे लोगों में सन्नाटा पसर गया। यह एक ऐसी बात है जिसे कोई जुबान पर लाना नहीं चाहता। अफगानिस्तान की राजधानी के अति सुरक्षित इलाके में भी इस बात पर एतबार करने वाले चंद ही लोग हैं। कुछ लोग ही स्वीकार करते हैं कि परमाणु शक्ित सम्पन्न अस्थिर पाकिस्तान के साथ युद्ध की संभावना बलवती होती जा रही है। अफगानिस्तान में गहराते संकट के बार में चर्चा करते समय भी अधिकांश लोग ‘पाकिस्तान के आक्रामक रवैये’ या और सटीक शब्द का प्रयोग करं तो ‘पाकिस्तानी उपनिवेशवाद’ का जिक्र जानबूझकर नहीं करते। सच यही है कि तालिबान और उसके मेहमान अल-कायदा को अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी सत्ता ने ही थोपा था (पाकिस्तान के अतिरिक्त केवल-सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ही काबुल में तालिबानी शासन को मान्यता दी थी)। पाकिस्तान के महत्वपूर्ण तबके की इच्छा हमेशा ही अफगानिस्तान में अपनी कठपुतली सरकार चलाने की रही है। पाकिस्तानी सेना और उसका खुफिया संगठन आईएसआई औपनिवेशिक सोच का शिकार हैं। वर्षों पहले से हमें इस बार में चेतावनी के संकेत मिल रहे हैं। पूर्वी अफ्रीका में अमेरिकी दूतावास पर हमले के बाद जब क्िलंटन प्रशासन ने अफगानिस्तान में क्रूा मिसाइल दागी थीं तब ओसामा बिल लादेन तो इस आक्रमण से बच गया किंतु हमले की जगह मौजूद आईएसआई के दो अफसर मार गए। तब किसी ने कड़ाई से यह जानने की कोशिश नहीं की कि आईएसआई के अधिकारी लादेन के पास क्या करने गए थे। उन दिनों और उससे पहले भी पाकिस्तान से कभी कड़वे सवाल नहीं पूछे गए। उल्टे सरकार और प्रशासन सदैव कांग्रेस को यह विश्वास दिलाते रहे कि पाकिस्तान परमाणु बम बनाने के लिए अमेरिकी सहायता का दुरुपयोग नहीं कर रहा है। यह वह दौर था जब सोवियत संघ के खिलाफ जंग के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को भरपूर मदद दी थी। वास्तव में 11 सितम्बर 2001 के बाद अमेरिकी सरकार तब सतर्क हुई जब पाकिस्तान के दो परमाणु वैज्ञानिकों मिर्जा युसुफ बेग और चौधरी अब्दुल माजिद से तालिबान के साथ निकट संबंध रखने को लेकर पूछताछ हुई। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले से पहले पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम के प्रमुख डा. ए. क्यू. खान की गतिविधियों की अनदेखी की जाती थी। डा. खान लीबिया और उत्तरी कोरिया को परमाणु तकनीक बेच रहे थे और इस काम के लिए पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों का उपयोग होता था। पाकिस्तान का नाम ही उससे जुड़ी समस्याओं की कहानी कहता है। वास्तव में यह कोई देश या राष्ट्र है ही नहीं। सन् 10 में चौधरी रहमत अली नामक विभाजन के पक्षधर एक मुस्लिम प्रचारक ने पाकिस्तान का नाम गढ़ा था। पाकिस्तान का मतलब है, - पंजाब, अफगान, कश्मीर और इंडस-सिंध। अंतिम शब्द इस्तान का उर्दू में अर्थ भूमि होता है। पाकिस्तान का शाब्दिक अर्थ है पवित्र लोगों का मुल्क। आसानी से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान शब्द के गर्भ में ही विस्तारवादी मंसूबे छिपे हैं। कश्मीर हिन्दुस्तान का हिस्सा है। इसी प्रकार मुसलमान होने के बावजूद अफगान लोग पाकिस्तान का अंग नहीं हैं। पंजाब का एक बहुत बड़ा भूभाग भी भारत में है। मजे की बात यह है कि पाकिस्तान शब्द में कोई ‘ब’ शब्द नहीं है जबकि मूल पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल भी शामिल था। (पाकिस्तान के नरसंहार के बाद पूर्वी पाकिस्तान ने अपनी मुक्ित के लिए संघर्ष किया और अब यह बांग्लादेश के रूप में अलग स्वतंत्र राष्ट्र है)। बलूचिस्तान जरूर पाकिस्तान का हिस्सा है किन्तु वहां दशकों से पृथक होने का संघर्ष चल रहा है। पाकिस्तान में सबसे पहले ‘प’ अक्षर आता है क्योंेकि इस मुल्क पर फौा के पंजाबी अफसरों का वर्चस्व है (पंजाब के फौाी बेनजीर भुट्टो से नफरत करते थे क्योंकि वह सिंध प्रांत की थीं)। एक बार मैंने लिखा भी था कि इस देश का नाम आसानी से ‘अकस्तान’ या ‘कपस्तान’ रखा जा सकता है। इन दोनों में कौन सा नाम होगा, यह इस पर निर्भर करगा कि कश्मीर या अफगानिस्तान पर अधिकार को लेकर लड़ी जा रही जंग में किसमें जीत होती है। यदि बात और सटीक ढंग से कही जाए तो पाकिस्तान की अफगानिस्तान पर नियंत्रण की मंशा कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ जारी अनवरत संघर्ष की रणनीति का एक हिस्सा है। अमेरिका की विदेश नीति में े बाद महत्वपूर्ण बदलाव आया और बुश प्रशासन ने अविश्वसनीय और जर्जर पाकिस्तान पर निर्भरता न रख भारत से मजबूत रिश्ता जोड़ने की पहल की। भारत दुनिया का एक महान, लोकतांत्रिक और बहुाातीय राष्ट्र है। हमार दो मित्र राष्ट्रों-अफगानिस्तान व भारत की राजधानियों में हाल में हुए बम विस्फोट स्थानीय विद्रोहियों की करतूत नहीं हैं। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि दोनों घटनाओं के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है। ऐसे में इसे किसी राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवाद ही कहा जाएगा। दूसरी ओर पाकिस्तान की सरामीं पर और पाक सेना व आईएसआई की नाक के नीचे क्वेटा शहर व जनजातीय इलाके अलकायदा की गतिविधियों के गढ़ बने हुए हैं। अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के दो प्रत्याशियों में एक बराक ओबामा की राय इस बार में ज्यादा स्पष्ट है। अमेरिका के तथाकथित सहयोगी पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के पक्षधर हैं और बिना लाग-लपेट के वह मानते हैं कि इराक युद्ध के मुकाबले अफगानिस्तान की लड़ाई कहीं महत्वपूर्ण है। वह अमेरिका के सबसे खतरनाक शत्रु के खिलाफ जंग तेज करने को पूर्णत: प्रतिबद्ध दिखते हैं। मुझे लगता है शायद यह भी एक तथ्य है जिसकी वजह से अधिकांश लोग अफगानिस्तान-पाकिस्तान युद्ध की बढ़ती संभावनाओं को स्वीकार करने से कतराते हैं। अमेरिका के डेमोकेट्र इस सच से मुंह चुराते हैं कि यदि नवम्बर में होने वाले चुनावों में उनका प्रत्याशी जीत जाता है और चुनाव पूर्व जो वायदे किए गए उन पर अमल किया जाता है तब युद्ध तेज हो जाएगा। लेखक अमेरिकी स्तंभकार और साहित्य आलोचक हैं । अमेरिकी पत्रिका स्लेट से साभार।

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