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ब्लॉग वार्ता : इंटरनेटकार, साहित्यकार या ब्लॉगर

या इस देश की साहित्य की लघु पत्रिकाओं, मासिक साहित्यिक पत्रिकाओं के दिन अब लद गए हैं? वैसे लदे तो पहले से ही थे, अब टपकने के दिन तो नहीं। यहां किसी अनिष्ट की ख्वाहिश नहीं है, बल्कि लघु पत्रिकाओं और व्यापक स्तर पर देखने की जिद है। अलग-अलग जिलों से अलग-अलग व्यक्ितयों के मार्फत निकल रही ये लघु पत्रिकाएं साहित्य को लोकतांत्रिक तो बना देती हैं लेकिन उनकी मौजूदगी काफी सीमित हो जाती है। क्या र्हा कि ये विश्वव्यापी हो जाएं। जिस डाकिए के भरोसे हिंदी में यह साहित्य का आंदोलन चल रहा है वो डाकिया भी अब मैदान से भागने की तैयारी में है। ब्लॉग पर अब बहुत से साहित्यिक मंच तैयार हो रहे हैं। रतलाम के मशहूर ब्लॉगर रवि रतलामी का ब्लॉग अपने आप में साहित्य का विशाल भंडार है। वो इंटरनेट जगत में साहित्य के सबसे बड़े वितरक बन गए हैं। वितरक इसलिए कि इनका काम रचनाओं को जमा कर विश्वव्यापी बनाना है न कि लाइब्रेरियों को बेच कर कमीशन खाना। रवि रतलामी ने साठ के करीब उपन्यासों को ब्लॉग पर उपलब्ध करा दिया है। चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा, राजश्री का पौराणिक उपन्यास-क्षितिज की संतान, असगर वजाहत का उपन्यास- गरात-बरसत। सूरा प्रकाश और के. पी. तिवारी ने चार्ली चैपलिन की आत्मकथा के बाद चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा का अनुवाद कर यहां ई बुक में डाल दिया है। पता मिजाज के अनुकूल ही है। द्धह्लह्लश्चज् rड्डष्द्धड्डठ्ठड्डद्मड्डr.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व रतलामी ने अद्भुत काम किया है। रवि कृपया ध्यान दें वाले अंदाज में लिखते हैं कि रचनाकार का प्रकाशन अवैतनिक अव्यावसायिक किया जाता है। ध्येय यह है कि उत्कृष्ट रचनाएं इंटरनेट के माध्यम से जन-ान को सर्वसुलभ हो सकें। नए-पुराने कवियों की कोई तीन सौ कविताएं यहां मौजूद हैं। साहित्य तो अपने समय को भी रचता है लेकिन अपने समय के साथ नहीं चला तो जनसुलभ कैसे होगा। रतलामी ने हिंदी में पीडीएफ फाइल बनाकर ई-बुक का चलन भी शुरू कर दिया है। असगर वजाहत का कहानी संग्रह- मैं हिंदू हूं इसे ढूंढ़ने में काफी समय लग गया। हिंदी पुस्तकों की दुकान पूछें तो कोई दिल्ली का दरियागंज बताता रहा तो कोई अपने शहर का रलवे स्टेशन। इंटरनेट इस समस्या का समाधान है। अब भी किसी को शक हो तो उसे रविवार को दिल्ली के सराय में होना चाहिए था। सराय सीएसडीएस की संस्था है जिसका एक काम फ्री सॉफ्टवेयर के आंदोलन को आगे बढ़ाना भी है। इस मौके पर लिटरचर इंडिया नाम की एक साहित्यिक पत्रिका भी लांच की गई। आने वाले समय में आपका पाठक अपने लेखकों के साथ लाइन चैट करंगे। चिट्ठी पाती भेजना बंद कर दीजिए। क्िलक कीािए द्धह्लह्लश्चज् द्यन्ह्लद्गrड्डह्लह्वrद्गन्ठ्ठस्र्न्ड्ड.ष्oद्वद्धन्ठ्ठस्र्न् इतिहासकार रविकांत ने बताया कि पोर्टल द्विभाषी है। हिन्दी के बहुत कम लोग हैं जो अंग्रेजी लिखते हैं अगर वो लिखें तो सेतु बनने का रास्ता निकल सकता है। अब ऑनलाइन पत्रिका का आगाज ही हो रहा है उपन्यासकार शानी को याद कर। उनकी बेटी सूफिया से बातचीत के जरिए शानी को फिर से समझने की कोशिश की जा रही है। सव्रेश्वर दयाल सक्सेना का परिचय दिया गया है। प्रेमचंद की कहानी ठाकुर का कुआं, पूरी पढ़ी जा सकती है। ईदगाह भी मौजूद है। साथ में एक पोल भी चल रहा है कि हिंदी के लोकप्रिय लेखक कौन हैं? पंत, अज्ञेय, प्रसाद, निराला, प्रेमचंद या महादेवी। साहित्य को उस समाज से जोड़ने की कोशिश जिसे हमारा साहित्य जगत संकोच की नजर से देखता है। नीलाभ ने कहा हिंदी के विद्वानों को तकनीक से दूर भागने की आदत छोड़नी होगी। यह और बात है कि मशहूर लेखक उदय प्रकाश कब से ब्लॉगिंग कर रहे हैं। द्धह्लह्लश्चज् ह्वस्र्ड्ड4श्चrड्डद्मड्डह्यद्ध.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक करते ही उनकी एक कविता आत्म से टकराने लगती है। आत्मा इतनी थका के बाद, एक कप चाय मांगती है, पुण्य मांगता है पसीना और आंसू पोंछने के लिए, एक तौलिया। ईश्वर से यही दुआ है कि इंटरनेट के इस कमाल पर हिंदी के प्रकाशकों की नजर न पड़े। उनकी तो बिल्कुल न पड़े जो पैसे लेकर किताब छापते हैं और जो मेहनताना देकर छापते तो हैं लेकिन रॉयल्टी पचा लेते हैं। ब्लॉगर न होते तो किस टीवी चैनल ने आपको बताया कि मशहूर साहित्यकार प्रभा खेतान नहीं रहीं। बताया भी तो क्या स्क्रीन के नीचे चलने वाली पट्टी से ज्यादा बताया? इस बीच मशहूर इतिहासकार डी. एन. झा ने मुझसे कहा कि वे भी ब्लॉगर बनना चाहते हैं। मुझे सिखा दो। ब्लॉगर बनने की उम्र नहीं होती। हिंदी के साहित्यकार सुन रहे हैं? लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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