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चीनी प्रयासों से हमारे वैज्ञानिक भौंचक

जलवायु पर्वितन के लिए ज्यादा जिम्मेदार कौन है ? अमेरिका जैसे बड़े देश या भारत और चीन जैसे विकासशील देश? यहां चल रही सस्टेनेबल डवलपमेंट कांफ्रेंस में अमेरिका और चीन के वैज्ञानिकों में इस मुद्दे पर खासी बहस छिड़ गई। अमेरिकी साइंटिस्ट अर्निम वाइक का मत था कि विकासशील देशों की वजह से समस्या गंभीर हो रही है। चीनी साइंटिस्ट ने इसका पुरजोर विरोध किया और ऐसे तर्क दे डाले कि कांफ्रेंस में मौजूद तमाम डेलीगेट हैरत में पड़ गए। चीनी वैज्ञानिक काउंसलर बॉंग केइमिंग ने कहा कि चीन समेत तमाम विकासशील देशों ने विकास का पैटर्न बदल लिया है जिससे ऊर्जा की खपत में कमी आ रही है और कार्बन उत्सर्जन घटा है। बकौल केइमिंग चीन में आबादी रोकने के लिए पिछले कुछ सालों के दौरान 30 करोड़ गर्भपात कराए गए हैं। इससे प्रतिवर्ष 1.3 अरब टन कार्बन उर्त्सजन घटा है। केइमिंग के अनुसार चीन में प्रति व्यक्ित कार्बन उत्सर्जन 4.4 टन है। वजह वहां के उद्योग हैं। लेकिन 60 फीसदी उत्पाद एक्सपोर्ट होते हैं। इसलिए बतौर उपभोक्ता वह ज्यादा कार्बन उर्त्सजन के लिए जिम्मेदार नहीं। प्रति व्यक्ित कार्बन उर्त्सजन अमेरिका में ज्यादा है जिसके लिए अमेरिकियों का लाइफ स्टाइल जिम्मेदार है। इसलिए जरूरी है कि विकसित देश लाइफस्टाइल में बदलाव लाएं। चीनी प्रतिनिधि ने सोलर तथा अन्य वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने के प्रयासों का भी ब्यौरा रखा। चीनी तर्को से भौंचक अमेरिकी वैज्ञानिक ने अंतत: हथियार डालते हुए कहा कि एक-दूसर पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने की बजाय सभी देशों को मिलकर कार्बन उर्त्सजन में कमी के उपाय करने चाहिए। बाद में इस कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम पहुंचे। उन्होंने कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ ऊर्जा खपत में कमी का दावा विरोधाभासी है। अलबत्ता वैज्ञानिकों को ऐसे उपाय खोजने चाहिए जिससे आर्थिक प्रगति भी जारी रहे और नई तकनीकों से ऊर्जा खपत में भी कमी लाएं।ं

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