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वित्त बाजार की ख़ता, अर्थव्यवस्था को साा

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल अमेरिका में जो हो रहा है वह उसका पिछले सौ साल का सबसे बड़ा वित्तीय संकट है। पहले कुछ अहम वित्तीय संस्थान और निवेश बैंक लडख़ड़ाए। फिर फेनी माय और फ्रीडी मैक जसी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करना पड़ा। इसके बाद पूरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था ही मंदी की चपेट में आती दिखी। और इस सबका झटका पूरी दुनिया में महसूस किया गया। इस अमेरिकी संकट के मूल में सबप्राइम उधारी का गहराई तक पहुंच जाना। र्का दो तरह के होते हैं- प्राइम और सब प्राइम। सब प्राइम में जोखिम ज्यादा होता है और इसे लेने वाले अक्सर चुकता नहीं कर पाते हैं। यह र्का अक्सर ऐसे लोगों को दिया जाता है जिनकी आमदनी कम होती है, या उधार चुकाने का उनका अतीत काफी खराब होता है, या फिर उनके पास अच्छा टिकाऊ रोगार नहीं होता। इसमें जोखिम ज्यादा होता है इसलिए ब्याज की दर भी ज्यादा वसूल की जाती है। इसके साथ ही कई और तरीके भी होते हैं। जसे दरों को व्यवस्थित करने का प्रावधान। इसमें शुरू में ब्याज दर काफी कम होती है ताकि र्कादार उसे आसानी से चुकता कर सके। बाद में यह दर बढ़ जाती है। इसी सब प्राइम की वजह से अमेरिका में घर के लिए र्का की मांग काफी बढ़ गई थी जिससे वहां के हाउसिंग उद्योग में खास उछाल आ गया। बढ़ती मांग से घर महंगे हुए तो लोगों ने इन घरों को गिरवी रखकर और र्का ले लिए। इस उम्मीद में कि कीमत और बढ़ेगी। जब तक ये कीमतें बढ़ती रहीं कोई समस्या नहीं आई। 1से 2006 के बीच अमेरिका में घरों की कीमतें दुगनी हो गईं। लेकिन जसे ही ब्याज दरं बढ़नी शुरू हुईं यह तेजी बरकरार नहीं रह सकी। पिछली दिसंबर तक ऐसे घरों की संख्या काफी बढ़ गई जिनका कोई खरीदार नहीं था। ज्यादा आपूर्ति की वजह से कीमतें टूटीं तो र्का डूबने लगे। यह सब प्राइम संकट की शुरुआत थी। लेकिन यह सब प्राइम संकट सिर्फ र्का देने और लेने वालों तक ही सीमित क्यों नहीं रहा? और इसका असर पूरी दुनिया पर क्यों पड़ रहा है? इसके पीछे हैं हाल ही की कुछ ताजा वित्तीय क्षाद। मार्डगेा बैक्ड सिक्योरिटीÊा और कोलैटरलाईड डैट आब्लीगेशंस ऐसे तरीके हैं जिससे र्कादाता अपने र्का को रिपैकेा करके अमेरिका और विदेशों के दूसर वित्तीय संस्थानों को बेच सकता है। इस तरह के र्का पर ब्याज अच्छा मिलता है इसलिए दुनिया भर के कई वित्तीय संस्थानों ने इसे खरीद लिया। सीधे शब्दों में कहें तोोो जोखिम था वह मूल र्कादाता तक सीमित नहीं रहा और दुनिया भर में बंट गया। जब घरों की कीमतें गिरने लगीं और र्का डूबने लगे या र्कादार अपने र्का समय से पहले ही अदा करने लगे तो सबसे पहला असर उन र्कादाताओं पर पड़ा जिन्होंने अपने र्का रिपैकेा करके बेचे नहीं थे। फिर धीर-धीेर असर उन लोगों तक पहुंचने लगा जिन लोगों ने ज्यादा कमाई के चक्कर में इस जोखिम को खरीद लिया था। और हर हफ्ते अमेरिका व दुनिया भर के वित्तीय संस्थानों के बढ़ते घाटे की खबरं आने लगीं। पूर संकट पर अमेरिका के मशहूर निवेशक वारन बफेट की टिप्पणी काफी मजेदार है। उनका कहना है कि ‘घरों की कीमतें जब गिरीं तो एक बहुत बड़े गोरखधंधे का पर्दाफाश हो गया। लहरं जब शांत होती हैं तो पता चलता है कि कौन नंगा तैर रहा था। अब पता पड़ा कि हमार बड़े वित्तीय संस्थान क्या कर रहे थे।’इसका भारत पर क्या असर पड़ा? दुनिया के तमाम विकसित देशों के विपरीत भारत के वित्तीय संस्थानों ने सब प्राइम र्का के जोखिम को कम ही खरीदा है। इसलिए उन पर काफी कम असर पड़ेगा। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि भारत इस अमेरिकी संकट से निष्प्रभावित रहेगा। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जल्द ही मंदी आने की आशंका है। इसका बुरा असर हमार निर्यात की मांग पर पड़ेगा। हालांकि अब हमारा निर्यात एशिया और एशिया के बाहर कई देशों में होता है, लेकिन फिर भी अमेरिका हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। कुछ ऐसे अमेरिकी वित्तीय संस्थान भी इसकी चपेट में आए हैं जो भारत के वित्तीय क्षेत्र में सक्रिय हैं। इनके कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चित हो गया है। अमेरिकी संस्थाओं के लिए आउटसोर्सिंग कर रहे कई बीपीओ और केपीओ पर भी संकट मंडरा रहा है। कम से कम तत्काल तो इनके कारोबार पर भी बुरा असर पड़ेगा। लेकिन लंबे अर्से के हिसाब से देखें तो भारतीय आउटसोर्सिंग कंपनियों के आसार अच्छे हैं क्योंकि अपने ग्राहकों को वे फायदे का सौदा देती हैं। फिर हाउसिंग सैक्टर के लिए भी कठिन समय है क्योंकि कई अमेरिकी कंपनियों ने इनमें निवेश किया हुआ है। यह परशानी उस समय खड़ी हो रही है जब देश में ब्याज दरं काफी ज्यादा हो चुकी हैं। अमेरिका के इस संकट ने विदेशी निवेशकों की जोखिम उठाने की क्षमता को कम कर दिया है। इसके अलावा वहां उधार का संकट भी पैदा हो गया है। इसका हम पर दो तरह से असर पड़ेगा। एक तो भारतीय बाजार में विदेशी निवेश का आना बंद हो जाएगा। विदेशी निवेश की भारत से वापसी भी शुरू हो गई है। पिछले साल से तुलना करं तो विदेश निवेशक अब खरीद के मुकाबले बिकवाली ही ज्यादा कर रहे हैं। इसकी वजह से भारतीय शेयर बाजार ठंडे पड़ गए हैं। दूसर पिछले कुछ समय से भारतीय कंपनियां विदेशों से उधार उठा रही थीं। विदेशों में अधिग्रहण के लिए भी और घरलू जरूरतों के लिए भी। अब दुनिया भर के वित्तीय संकट के चलते यह बाजार भारतीय कंपनियों के लिए सूख सा गया है। इसकी वजह से र्का की लागत भी बढ़ गई है। इसका असर यह होगा कि इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए पैसा ज्यादा उपलब्ध नहीं होगा और ऐसे धन की लागत भी बढ़ जाएगी। रुपए की कीमत गिरने से विदेशी र्का वैसे ही महंगा हो गया है। ऊंची ब्याज दर और दुनिया के विपरीत माहौल को देखते हुए इस साल और अगले साल भारत की विकास दर कम रहने की आशंका है। अमेरिका का यह वित्तीय संकट अगर और बढ़ता है तो भारतीय कंपनियों और अर्थव्यवस्था के लिए और परशानियां खड़ी होंगी। अमेरिकी संकट ने भारतीय अर्थव्यवस्था को सुस्त रफ्तार के दुष्चक्र में तो खर फंसा ही दिया है। हालांकि इन तात्कालिक परशानियों के बाद के दौर के लिए भारत की संभावनाएं अभी भी अच्छी बनी हुई हैं। लेखक क्रिसिल के निदेशक और प्रिंसिपल इकॉनमिस्ट हैं।

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