DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

धर्मातरण पर बहसं

लोकतंत्र में किसी भी विषय पर बहस का स्वागत होना चाहिए, विचारों का खुला आदान-प्रदान लोकतंत्र का आधार होता है। लेकिन बहस का औचित्य उसके स्थान और समय के संदर्भ में ही आंका जा सकता है। इसलिए चुनावों से ठीक पहले भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की धर्मातरण पर बहस की मांग पर कुछ शक होता है। यह किसी से छुपा नहीं कि इन दिनों ओडिसा और कर्नाटक में सांप्रदायिक हिंसा का माहौल है। दोनों ही जगह भाजपा सत्ता में है, ओडिसा में बीजू जनता दल के साथ और कर्नाटक में अकेले। दोनों ही जगह हिंसा में ऐसे संगठन शामिल रहे हैं जो भाजपा से वैचारिक और संगठनात्मक रूप से करीब बताए जाते हैं। अत: बहस की मांग कुछ वैसी ही है जसे गुजरात दंगों के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिजारी वाजपेयी द्वारा सांप्रदायिकता पर बहस की जरूरत बताना। शांति के वातावरण में धर्मातरण पर बहस पर किसी को एतराज नहीं होगा, लेकिन आज के माहौल में तो प्राथमिकता हिंसा रोकना और हिंसा के शिकार लोगों को राहत पहुंचाना होना चाहिए, और भाजपा शासित राज्यों की सरकारं इन कामों में बुरी तरह असफल रही हैं। धर्मातरण की प्रतिस्पर्धा और सांप्रदायिक हिंसा को संघ परिवार के संगठन जिस तरह हवा दे रहे हैं। अगर यह माहौल न हो तो धर्मातरण की राजनीति, उसके अर्थशास्त्र और राजसत्ता की उसमें भूमिका पर कुछ सुविचारित और गंभीर सवाल उठाए जा सकते हैं। दिक्कत यह है कि धर्मातरण में लिप्त सभी संगठन, जो किसी भी धर्म से जुड़े हैं, धार्मिक बहुलता के खिलाफ हैं और व्यक्ित के अपना धर्म चुनने की आजादी के भी। दूसर व्यक्ित की धार्मिक मान्यताओं या विश्वासों पर वर्चस्व जमाने की होड़ हिंसा, प्रलोभन और दबाव के बिना नहीं चल सकती। इसलिए फिलवक्त व्यक्ित की स्वतंत्र इच्छा से धर्मातरण की बात भी बेमानी है और उसे लेकर बहस की भी। मुश्किल यह है कि देश के अनेक पिछड़े आदिवासी इलाकों में धर्मातरण की होड़ विभिन्न धार्मिक संगठनों में तेज हो रही है और संभव है कि आने वाले दिनों में इनका टकराव और तेज हो। ऐसे में जिम्मेदार राजनैतिक ताकतों को पहले हिंसा रोकने पर जोर देना चाहिए फिर शांति से इस समस्या पर मूलभूत विचार किया जा सकता है।ंं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: धर्मातरण पर बहसं