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जुमअतुल वदा

अलवदा, अलवदा ऐ माहे रमजान। रमजान के अंतिम जुमे के खुतबे का संदेश यही है कि रमजान अब हम से रुखसत हो रहा है। वैसे तो सभी दिन और रात अल्लाह के हैं, लेकिन जुमे का अपना एक विशेष महत्व है, इसीलिए इसे सभी दिनों का सरदार कहा जाता है और रमजान के अंतिम जुमे को जुमअतुल वदा कहा जाता है। रमजान का जुमा आम माफी और हमत का दिन होता है। अल्लाह ताला इस दिन अपने बंदों की तौबा कुबूल करता है और माफ करता है। हदीस शरीफ में आता है कि जुमे में एक पल ऐसा भी आता है जिसमें मोमिन की जायज दुआ कुबूल होती है। एक पल तो वह है जब ईमाम खुतबे के समय बैठता है उस समय बिना हाथ उठाए दुआ करना चाहिए दूसरा खुतबा शुरू होने से लेकर नमाज के खत्म होने तक का समय है। हदीस शरीफ में आता है कि जुमे के दिन पांच विशेषताएं हैं। 1. इसी दिन अल्लाह ताला ने हारत आदम को पैदा किया। 2. इसी दिन हारत आदम को जमीन पर भेजा गया। 3. इसी दिन हारत आदम की जान गई। 4. इस दिन बंदा अपने रब से जो सवाल करता है अल्लाह ताला उसे देता है शर्त यह है कि वह किसी हराम चीज का सवाल न कर। 5. जुमे के दिन ही कयामत (प्रलय) होगी। जुमअतुल वदा वास्तव में हमें यह एहसास दिलाता है कि हम अपना जायजा लें कि इस मुबारक महीने से हमने कितना फायदा उठाया। हम उसके शुक्रगुजार बंदे बनें या फिर उसके प्रकोप का पात्र। अल्लाह के रसूल ने फरमाया कि बहुत से रोोदार ऐसे हैं जिन्हें भूख और प्यास के अतिरिक्त कुछ नहीं होता और अल्लाह को भी ऐसे रोोदारों की कोई परवाह नहीं। अल्लाह से डरते हुए रोा रखना चाहिए और वही लोग कामयाब हैं जिन्होंने रमजान का महीना पाया और अल्लाह को राजी कर अपने गुनाहों को माफ कराने में कामयाब हो गए।

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