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घबराने का नहीं सबक सीखने का वक्त

यह समस्याओं से भरा दौर है। हमारे मस्तिष्क पर आतंकवाद और आर्थिक सुरक्षा की घटनाएं छायी हुई हैं। भारत में आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं की व्याख्या अलग से होनी चाहिए। मैं तो यहां विश्वव्यापी आर्थिक संकट और भारत पर इसके होने वाले असर पर ही प्रकाश डालने का प्रयास करूंगा। पिछले कुछ माह के दौरान अमेरिका की अनेक प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थाएं आर्थिक संकट के चलते ढह गईं। कुछ महीने पहले चीन और सिंगापुर की वित्तीय संस्थानों ने दुनिया के सबसे बड़े अमेरिकी बैंकों के शेयर बड़ी संख्या में खरीदे। कुछ अन्य व्यक्ितयों विशेषकर मध्य एशिया के अमीरों ने भी इन अमेरिकी संस्थानों में बड़ी मात्रा में निवेश किया। दुनिया के वित्तीय मोर्चे पर पिछले सप्ताह कई बुरी घटनाएं देखने को मिलीं। भयभीत कर देने वाले घटनाक्रम में अमेरिकी बैंकिंग संस्थान बीयर एंड ईस्टर्न बंद हो गई तथा अमेरिकी फेडरल बैंक ने गिरवी के धंधे से जुड़ी एक संस्था को सहायता देकर बचाया। सरकारी बैंक की बैसाखी के इस सहार को राष्ट्रीयकरण का दर्जा ही दिया जाएगा। दूसरी ओर 185 बरस पुरानी संस्था लीमन का दिवाला निकल गया। मैरील लिंच को 50 अरब डालर में बैंक आफ अमेरिका को बेच दिया गया। इसी प्रकार अमेरिका की सबसे बड़ी बीमा कंपनी अमेरिकन इंश्योरंस ग्रुप (एआईाी) को 85 अरब डालर की सरकारी सहायता देकर बचाया गया। अब इस बीमा कंपनी में सरकारी हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है, इसका मतलब एक और निजी कंपनी का राष्ट्रीयकरण माना जाएगा। इस उथल-पुथल से बची दो बड़ी कंपनियां गोल्डमैन तथा मार्गन स्टेनले भी गंभीर संकट में हैं। रोगार के मोर्चे पर अमेरिका का हाल बुरा है जिसका विपरीत असर वहां के नागरिकों पर पड़ता दिख रहा है। संकट में घिरी कंपनियों को डूबने से बचने के लिए राष्ट्रपति बुश ने सरकारी खजाने का मुंह खोलकर नए किस्म के संकट क ो न्यौत दिया है। सवाल यह उठता है कि आखिर इस गहर आर्थिक संकट के पीछे क्या कारण हैं? मौजूदा संकट को विश्वव्यापी ढांचागत असंतुलन की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यह असंतुलन इस कारण उत्पन्न हुआ क्योंकि अमेरिका में खपत तो जमकर होती है किन्तु बचत न के बराबर। दुनिया के अन्य देशों, विशेषकर एशियाई राष्ट्रों की बचत के बल पर अमेरिकी खपत टिकी हुई है। बचत की प्रवृत्ति के चलते एशिया के अनेक देशों के पास डालर का विशाल सुरक्षित भंडार है। दूसर देशों की बचत के बल पर खपत को लंबे समय तक बनाए रखना कठिन होता है। करों में छूट देकर तथा रक्षा बजट को बढ़ाकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने आग में घी डालने का काम किया। इससे राजकोषीय घाटा बहुत बढ़ गया और परिणामस्वरूप मौजूदा आर्थिक संकट का तूफान आ गया। ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्र में (सब प्राइम) बड़ी संख्या में करा देने के चलन से आर्थिक संकट और गहरा गया। बिना उचित मूल्यांकन के ज्यादा दर पर घरों का करा देने से इसकी शुरुआत हुई। ऋण देने वाली संस्थाओं ने गिरवी इसी परिसम्पत्तियों के आधार पर अपनी आर्थिक तंदुरुस्ती का बढ़-चढ़कर बखान किया। इस पैमाने से बर्न एंड लीमन ब्रदर्स ने अपने शेयरों को 30 से 40 गुना ज्यादा आंका तथा जब परिसम्पत्तियों के मूल्य में मामूली गिरावट आई तब तरलता का संकट खड़ा हो गया और कंपनियां दिवालिया हो गईं।कैड्रिट रटिंग करने वाली एजेंसियों को जोखिम का ध्यान रखना चाहिए किन्तु यह काम करने वाली एजेंसियों का हित उन कंपनियों से जुड़ा था जिनका वे मूल्यांकन करती थीं। ऐसे में सही मूल्यांकन नहीं किया गया और कंपनियों की साख बढ़-चढ़कर बताई गई। गलत मूल्यांकन के चलते अनावश्यक ऋण दिए गए और गैरारूरी खर्चे भी हुए। अमेरिका के सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन तथा फेडरल रिार्व जसी नियामक संस्थाओं ने समय रहते कदम नहीं उठाए। नियामक संस्थाएं जब जागी तब बहुत देर हो चुकी थी। इसे उनकी विफलता ही माना जाएगा। अब देखने वाली बात यह है कि इस संकट का भारत पर क्या असर पड़ता है। दुनिया को आर्थिक प्रबंधन का उपदेश देने वालों की पोल खुल चुकी है, इसलिए उन्हें अब खामोश हो जाना चाहिए। भारत में बैंकिंग क्षेत्र में उदारीकरण की नीति अपनाने तथा विदेशी बैंकों की भूमिका के विस्तार की वकालत के तर्को को अब संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा। अपने घर का बंटाधार कर देने वालों को दूसरों को पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं है। बंकिंग और वित्तीय सुधारों की पैरवी करने वालों और निजी व विदेशी बैंकों को खुली छूट देने के हमदर्द लोगों को अमेरिका में आए आर्थिक संकट से गहरा झटका लगा है। अब सार्वजनिक बैंकों की कार्यकुशलता सुधारने पर ध्यान दिया जाएगा जबकि बैंकिंग क्षेत्र में उदारीकरण की राह अपनाने की नीति अवरुद्ध हो जाएगी। अमेरिकी सरकार ने अपनी वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए जिस प्रकार खजाने से सहायता दी है उससे राष्ट्रपति बुश को कामरड बुश कहना अतिशयोक्ित नहीं होगा। निश्चय ही इस संकट का भारत पर प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव पड़ेगा। यदि संकट के कारण अमेरिका मंदी की चपेट में आ गया तब हम पर सीधा असर पड़ेगा और हमार निर्यात पर मंदी की मार पड़ेगी। वैेस तो रुपया कमजोर पड़ने से हमार निर्यात को लाभ पहुंचा है किन्तु यदि मंदी का दौर शुरू हो गया तो मांग ही घट जाएगी। ऐसे में निर्यात पर चोट पहुंचना लाजिमी है। सवाल केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है क्योंेकि उसके आर्थिक संकट का असर यूरोप, जापान और चीन पर भी पड़ेगा। इस सबका प्रभाव भारत के निर्यात पर पड़ना स्वाभाविक है। तरलता का संकट आने पर शेयर बाजार कमजोर पड़ेगा तथा उद्योगों के लिए धन जुटाना कठिन हो जाएगा। साथ ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी कमी आएगी। भारत के बैंकिंग क्षेत्र का अमेरिकी बैंकों से मामूली जुड़ाव है, इसलिए अपनी बैंकिंग और वित्तीय संस्थाओं पर संकट का असर सीमित ही रहेगा। अंतरराष्ट्रीय खपत में आई कमी की भरपाई घरलू खपत बढ़ाकर की जा सकती है और इस प्रकार आर्थिक विकास की दर को भी बरकरार रखा जा सकता है। तरलता और ऋण संकट का सामना करने के लिए कदम उठाए जाना जरूरी है। कुल मिलाकर दुनिया का परिदृश्य अनिश्चय से भरा है। इसका असर भारत की साफ्टवेयर कंपनियों-विप्रो, इंफोसिस, टीसीएस पर पड़ेगा। विदेशी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में काम करने वाले भारतीय पेशेवर भी इससे प्रभावित होंगे। संक्षेप में कहें तो हमें सतर्क रहने तथा मौजूदा परिस्थिति के मुताबिक नीति बनाने की जरूरत है। घरेलू मांग, उच्च बचत व निवेश दर के चलते हमार लिए आठ प्रतिशत की विकास दर बनाए रखना संभव है। अमेरिका में जो हुआ, उससे हमें सबक सीखना चाहिए। संकट से घबराने के बजाय सही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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