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आठ वर्ष : 917 ग्रामीण पुलों में 397 ही बने

अलग राज्य गठन के बाद बड़े अरमान और विजन के साथ मुख्यमंत्री ग्राम सेतु योजना की शुरुआत की गयी थी। मकसद था गावों को जोड़ना और सड़क और पुल-पुलियों की नेटवर्किंग खड़ा करना। आठ साल में वृहत तथा मध्यम आकार के पुलों की स्वीकृति दी गयी। मार्च 2008 तक 3योजनाएं ही पूरी की जा सकी हैं। विधानसभा में इस योजना को लेकर सरकार की हर बार घेराबंदी होती रही है। राधाकृष्ण किशोर ने एक बार फिर इस मामले को उठाया है। किशोर का कहना है कि गांवों के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण योजना की दुर्गति चिंता वाली बात है। सीएम सेतु योजना के क्रियान्वयन में पैसे की कमी भी बाधक है। जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा और जरूरत की योजनाएं टेकअप नहीं हो रहीं।ड्ढr चालू वित्तीय वर्ष में इस योजना के लिए 115 करोड़ कर्णाकित है। इस राशि के अलावा और 100 करोड़ की जरूरत है। अतिरिक्त आवंटन लेने की प्रक्रिया शुरू की गयी है। पर्याप्त राशि नहीं होने, टेंडर का लफड़ा तथा समय सीमा पर काम पूरा नहीं होने के कारण भी बड़ी संख्या में योजनाएं घिसट रही हैं। 2003-04 की कई योजनाओं पर भी काम पूरा नहीं हो पाया है। पुल निर्माण की क्वालिटी पर भी सवाल खड़ा होने लगे हैं। 520 योजनाओं को पूरा करने की चुनौती है।ड्ढr योजना की हालत पर गौर करने से पता चलता है कि बरसात से पहले योजना स्वीकृति और बरसात के बीच में टेंडर फाइनल नहीं होने से भी काम प्रारंभ होने में देर होता है। मानसून सत्र में राधाकृष्ण किशोर के सवाल के जवाब में सरकार ने कहा है कि योजनाओं का क्रियान्वयन तथा टेंडर की प्रक्रिया जारी है। लेकिन रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि सेतु योजना दम तोड़ रही है। ं

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