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अनन्य थीं प्रभा खेतान

प्रभा खेतान (1 नवंबर 1सितंबर 2008) को मैं एक लेखिका के रूप में ही जानती थी। बाद में पता चला कि वे उद्यमी भी हैं। उद्योग और साहित्य दोनों क्षेत्रों में उन्होंने अपने को स्थापित किया था। अपने बूते। वे स्वयंसिद्धा थीं। यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वे इस तरह चली जाएंगी। महा 66 वर्ष क्या जाने की उम्र है? 1सितंबर को सुबह सीने में दर्द की शिकायत होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उसी दिन आपात परिस्थितियों में उनकी बाईपास सर्जरी हुई, लेकिन उस सर्जरी के बाद उनकी स्वाभाविक हृदयगति नहीं लौट पाई और आधी रात वे मृत घोषित कर दी गईं। वे सशरीर हमार बीच भले न हों, अपने सृजन के कारण वे लंबे समय तक बची रहेंगी। उद्यमी होने के कारण उन्होंने दुनिया के अनेक देशों की यात्राएं की थीं। कदाचित उन यात्राओं ने ही उनकी दृष्टि की दुनिया को बहुत-बहुत विस्तार दिया। प्रभा के जीवन से यह सीख ली जा सकती है कि अपने जीवन का निर्माण स्वयं अपनी तरह कैसे किया जा सकता है। प्रभा जब बच्ची थीं, तभी घर के भीतर ( और बाहर भी) स्त्री की यंत्रणा देखी थी। इसीलिए इस यंत्रणा के खिलाफ उन्होंने आजीवन रचनात्मक संघर्ष किया। उनकी आत्मकथा अन्या से अनन्या में उनकी जिस विद्रोही और स्वतंत्रचेता व्यक्ितत्व का परिचय मिलता है, वह मेरी राय में अनन्य है। प्रभा ने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कालेज से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने के बाद मशहूर फ्रांसीसी दर्शनिक ज्यां पॉल सार्त् के अस्तित्ववाद पर पीएचडी की। साहित्य जगत में उन्होंने कवि के रूप में प्रवेश किया था। उनकी पहली कविता 1में सुप्रभात नामक पत्रिका में तब छपी थी, जब वे सातवीं कक्षा की छात्रा थी और तब उनकी उम्र महा 12 साल थीं। पढ़ाई और कविताई साथ-साथ चलती रही। प्रभा का प्रथम काव्य संग्रह अपरिचित उााले 1में आया था। उसके बाद 1में दूसरा संग्रह सीढ़ियां चढ़ती हुई मैं आया। परवर्ती काल में एक और आकाश की खोज में (1ृष्णधर्मा मैं (1हुस्नबानो और अन्य कविताएं (1और अहिल्या (1संग्रह आए और हिंदी जगत में समादृत हुए। कविता को साधने के उपरान्त प्रभा ने गद्य को साधिकार स्पर्श आरंभ किया। उनका पहला उपन्यास आओ पेपे घर चले 10 में आया। उसके बाद उन्होंने एक से बढ़ कर एक उपन्यास लिखे- तालाबंदी (1अग्निसंभवा (1एड्स (1छिन्न मस्ता (1अपने-अपने चेहर (1पीली आंधी (1और स्त्री पक्ष (1। इन औपन्यासिक कृतियों में प्रभा एक समर्थ, परिपक्व और उत्कृष्ट कथा शिल्पी के रूप में सामने आईं। उनके उपन्यासों की स्त्री पात्र अपनी तरह से अपने जीवन का निर्माण करतीं और अपनी पहचान के लिए जूझतीं दृष्टिगोचर होती हैं। उनके कई उपन्यास बांग्ला में भी अनूदित होकर छपे। हमने खुद भाषा बंधन में उनका उपन्यास तालाबंदी धारावाहिक छापा था। इस उपन्यास में बताया गया है कि बंगाल में एक के बाद एक कल-कारखानों में तालाबंदी के यथार्थ पर रोशनी डाली गई हैं। पीली आंधी उपन्यास में माधव बाबू और पद्मावती जसे चरित्रों को यदि अमरत्व मिला, तो यह प्रभा के कथा सृजन की सामथ्र्य का एक दृष्टांत है। प्रभा ने सिर्फ पद्य और गद्य को ही नहीं साधा, उन्होंने अपने को एक विशिष्ट अनुवादक भी सिद्ध किया। सिमोन द बोउवार की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक द सेकेंड सेक्स का हिन्दी अनुवाद उन्होंने स्त्री उपेक्षिता शीर्षक से किया था। सार्त् पर डॉक्टरट करने के अलावा उन्होंने सार्त् की जीवनी, शब्दों का मसीहा सार्त् लिखा। अलवेयर कामू : वह पहला आदमी भी लिखा। स्त्री विषयक उनके निबंधों के तीन संग्रह उपनिवेशवाद और स्त्री, मुक्ित-कामना की दस वार्ताएं, बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ, भूमंडलीकरण और स्त्री के प्रश्न हिन्दी जगत में स्त्री-विमर्श को नई ताप देने वाले साबित हुए। प्रभा का यह आकलन सही है कि स्त्री के जीवन पर भूमंडलीकरण का प्रभाव कई कोणों से पड़ रहा है। राष्र्ट् बनाम भूमंडलीकरण अथवा बाजार बनाम समाज जसे सरलीकरण पर सवार होकर स्त्री की स्वाधीनता के पैरोकार इन प्रभावों का आकलन नहीं कर सकती। मुझे लगता है कि आज स्त्री विमर्श को केंद्र में ले आने के पीछे जिन चुनिंदा लेखकों व कार्यकर्ताओं का योगदान है- उनमें प्रभा अनन्य है। स्त्री विषयक किताबों ने लेखिका को स्त्रीवादी चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित किया। स्त्री विमर्श में सिर्फ लेखक होने के नाते ही वे शरीक नहीं होती रहीं, बल्कि स्त्री चेतना वाले कार्यो में सक्रिय रूप से हिस्सा भी लेती रहीं। कोलकाता के 13वर्ष पुराने कोलकाता चैंबर ऑफ कॉमर्स की वे पहली महिला अध्यक्ष रहीं। प्रभा खेतान की एक बड़ी खूबी यह थी कि वे बड़ी सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। उन्होंने अनेक लेखकों- कलाकारों और पत्र-पत्रिकाओं की समय-समय पर आर्थिक मदद की। उनकी संस्था प्रभा खेतान फाउण्डेशन ने भी संस्कृति कर्मियों और सांस्कृतिक गतिविधियों की बहुविध मदद की।ं

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