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प्रॉपर्टी बाजारच की देन है अमेरिकी संकट

ौसे-ौसे अमेरिकी वित्तीय संकट गहराता जा रहा है भारत में इसका असर विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ता जा रहा है। आने वाले दिनों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशों से मिलने वाली वाणिज्यिक उधारी और कंपनियों के बीच विलय एवं अधिग्रहण पर इसका असर अधिक स्पष्ट देखा जा सकेगा। अमेरिकी सरकार अपने डूबते वित्तीय संस्थानों को उबारने के लिए 700 अरब डॉलर के राहत पैकेज को पारित करवाने की जद्दोजहद में लगी हुई है वहीं दूसरी तरफ दुनियाभर के शेयर बाजारों में वित्तीय संकट से अनिश्चितता और घबराहट का माहौल बना हुआ है। करीब साठ अरब डॉलर का राजस्व कमाने वाला अमेरिका का निवेशक बैंक लीमन ब्रदर्स दिवालिया हो गया, सब-प्राइम संकट से जूझ रहे मेरिल लिंच को बैंक ऑफ अमेरिका का सहारा लेना पड़ा और दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कंपनी अमेरिकी इंटरनेशनल ग्रुप (एआईजी) को संभालने के लिए वहां की सरकार को 85 अरब डॉलर की राशि उसमें झोंकनी पड़ी। अमेरिका का सबसे बड़ा बचत एवं ऋण बैंक वॉशिंगटन म्यूचुअल फंड डूब गया। वाणिज्य एवं उद्योग मंडल पीएचडी चैंबर की वरिष्ठ अर्थशास्त्री शोभा आहूजा के मुताबिक अमेरिका के इस पूरे वित्तीय संकट के पीछे अमेरिकी आवास बाजार में संपत्तियों के दाम में पहले उफान और फिर गिरावट आना प्रमुख वजह रही है। अमेरिकी निवेश कंपनियों ने ज्यादा आय कमाने के लिए बड़ा जोखिम उठाया। जिन संपत्तियों की साख अच्छी नहीं थी उनके लिए भी कर्ज दिया। ऐसी आवास संपत्तियों को गिरवी रखने वाली संस्थाओं को भी नुकसान झेलना पड़ा। अमेरिका का यह संकट पिछले एक-दो सालों से शुरू हो चुका था और इसका असली असर पिछले साल के अंत में सामने आने लगा। सुश्री आहूजा का मानना है कि आने वाले एक-दो साल में इसका असर दिखाई देगा।

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