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पोते भए अंग्रेजीदां तो भला हम क्यूं रहें पीछे

अपने पोते पोतियों और मॉल कल्चर में रचने बसने के लिए उम्रदराज लोग भी इन दिनों अंग्रेजी बोलना सिख रहे हैं। बदलते आधुनिक परिवेश में युवाओं को ही नहीं बल्कि दादा-दादी की उम्र के लोगों को भी पर्सनेलिटी की चिंता सताने लगी है। ऐसे में कोई सामान्य सा दिखने वाला बुजुर्ग महिला या पुरुष रिटेल शॉप, मॉल्स या बस में इंग्लिश में बात करता दिखे तो चौंकियेगा नहीं। अब जमाने के साथ वे भी अपडेट हो रहे हैं। शहर में चल रहे तीन दर्जन से अधिक इंग्लिश स्पीकिंग इंस्टीटय़ूट में उम्रदराज लोगों की संख्या अच्छी खासी है। ये नौकरी के लिए नहीं बल्कि घर और बाहर सामंजस्य बैठाने को ट्रेनिंग ले रहे हैं। सुबह और शाम को इनकी भीड़ तमाम संस्थानों में उमड़ती है। तिकोना पार्क स्थित अमेरिकन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंग्लिश लैंग्वेज के ट्रेनर रमेश जिंदल ने बताया कि वह जमाना लद गया जब दादा-दादी उम्र के लोग घरों में बैठ गीता या रामायण पढ़ा करते थे। पोते पोतियों के साथ सामंजस्य बैठाने के लिए उन्हें भी पर्सनेलिटी ग्रूमिंग करनी पड़ रही है। इंस्टीटय़ूट में 40 से 60 आयु वर्ग के दर्जन भर से अधिक लोग इंग्लिश पढ़ना लिखना सीख रहे हैं। उन्होंने बताया कि कॉस्मोपोलिटिन सिटी में इंग्लिश स्पीकिंग के बिना कोई गुंजाइश नहीं है। बढ़ते मॉल कल्चर ने इसकी आवश्यकता और अधिक बढ़ा दी है। 46 वर्षीय पेशे से एकाउंटेंट रमेश रस्तोगी ऑफिस के बाद सीधे इंग्लिश स्पीकिंग इंस्टीटय़ूट जाते हैं। पिछले दो महीने से अमेरिकन लैंग्वेज में स्पीकिंग सिख रहे हैं। वह बताते हैं कि आम बोल चाल की भाषा में इंग्लिश का प्रयोग हो रहा है। हिन्दी की जगह हिंग्लिश ने ली है। ऐसे में इंग्लिश बोलना-सिखना वक्त की मांग है। सेक्टर 22-23 स्थित इंग्लिश स्पीकिंग इंस्टीटय़ूट के संचालक सचिन अभिनव ने बताया कि एक बैच में औसतन तीस से चालीस बुजुर्ग होते हैं। इनमें स्पीकिंग सिखने का जज्बा युवाओं से अधिक है। ट्रेनिंग के दौरान इनका प्रदर्शन बेहतर होता है।

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