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विरोध प्रदर्शन ठीक, हिंसा अनुचित

लोकतंत्र में अपनी बातें कहने का सबको हक है। लोग विरोध प्रदर्शन के लिए कई तरीके अपनाते हैं। इसमें जुलूस, रैली, पदयात्रा आदि शामिल हैं। लेकिन वर्तमान युग में ये प्रदर्शन शांतिपूर्ण नहीं रहा। जुलूस में लाठी-डंडे से लैश युवक आगे-आगे चलते हैं, जो शक्ित प्रदर्शन कर लोगों को भयभीत कर देते हैं। इस संबंध में आम लोगों की राय ली गयी। स्कूल टीचर माधव कुमार ने कहा कि हमारे देश में लोकतंत्र है। यहां सबको समान अधिकार दिया गया है। लोग अपनी बात रख सकते हैं। लेकिन हिंसा प्रदर्शन किसी भी हालत में समर्थन योग्य नहीं है। कंस्ट्रक्शन व्यवसाय से जुड़े संजीव चौधरी कहते हैं कि हिंसा से कोई चीज हासिल नहीं की जा सकती। राजनेताओं को चाहिए कि वे अपने कार्यकर्ताओं को तोड़-फोड़ आदि से बचने की बात बतायें। व्यवसायी राजेश कुमार वर्मा का मानना है कि कुछ शरारती तत्व ही जुलूस में लाठी-ोडंडा लेकर पहुंचते हैं। उन्हें न तो नीति की परवाह है और न ही मुद्दों के बार में। उन्हें भय प्रदर्शन करने में एक तरह का आनंद आता है। नेताओं को चाहिए एसे लोगों को जुलूस में शामिल होने से रोके। अंडा विक्रेता प्रदीप कहते हैं कि आजकल जुलूस के नाम से ही डर लगता है। रोड के बगल में छोटी सी दुकान है। जुलूस में शामिल लोग जबरदस्ती करते हैं। वे राह चलते लोगों पर लाठी तो बरसाते ही हैं, साथ में दुकानों को भी नहीं छोड़ते। एसे में रोगार बंद हो जाता है। जीतेंद्र बासु कल्याण विभाग में काम करते हैं। उनका कहना है कि रैली के माध्यम से लोग अपनी बात रखते हैं। लेकिन यह शांतिपूर्ण ढंग से होना चाहिए। व्यवसायी दीनेश प्रसाद का मानना है कि हर व्यक्ित को अपनी बातें रखने का अधिकार है। लेकिन इसमें हिंसा प्रदर्शन कतई उचित नहीं है। लोग भय प्रदर्शन कर अपनी मांग मनवाना चाहते हैं। एसे में न तो उनका उद्देश्य सफल हो पाता है और न ही अपील को सही दिशा मिल पाता।

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