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कम मतदान के मायने

हालांकि हमारे मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने बिना किसी बड़ी घटना के आम चुनाव के दूसरे चरण का मतदान हो जाने पर खुशी जताई है पर इसका कम प्रतिशत लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। पहले चरण के 60 प्रतिशत मतदान के बाद दूसरे चरण में 55 प्रतिशत मतदान, पांच फीसदी गिरावट का संकेत तो है ही इसके और भी कई मायने हैं। क्या ऐसा इसलिए हुआ कि चुनाव आयोग ने सुरक्षा व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद कर दी थी कि दूसरे चरण में हिंसा तो कम हुई पर मतदाता बूथ तक नहीं आए? या फिर एक हफ्ते के भीतर ही गर्मी का ताप इतना बढ़ गया कि लोगों ने लोकतंत्र को बचाने के बजाय अपने शरीर को बचाने में ज्यादा भलाई समझी? मौसम और नक्सली असर से अलग दूसर चरण के मतदान में एक और प्रवृत्ति देखी गई, वह असमंजस और उदासीनता की तरफ भी संकेत करती है यह उदासीनता केंद्र सरकार के गठन में क्षेत्रीय दलों की क्षीण संभावना के चलते भी हो सकती है या फिर किसी की सरकार न बनते देख कर भी हो सकती है। कम मतदान की यह प्रवृत्ति जम्मू और कश्मीर में होती तो कोई खास बात नहीं थी। लेकिन आश्चर्यजनक तौर पर कम मतदान जिन इलाकों में हुआ है, वे मुख्यत: हिंदी भाषी इलाके हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में 44 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 45 व झारखंड में 47 प्रतिशत मतदान साफ दिखा रहा है कि इन इलाकों के मतदाताओं के भीतर न तो राष्ट्रीय दलों को लेकर ज्यादा उत्साह है, न ही क्षेत्रीय दलों को लेकर। दूसरी तरफ त्रिपुरा में 7प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 68 प्रतिशत और असम में बायकॉट के बावजूद 62 प्रतिशत मतदान यह साबित करता है कि उनमें दिल्ली की सत्ता के गठन में योगदान देने का उत्साह है। एक और ध्यान देने लायक बात यह है कि त्रिपुरा को छोड़ कर दूसर चरण के इन सभी राज्यों में 2004 के चुनाव की तुलना में मतदान का प्रतिशत गिरा है। जाहिर है इस उदासीनता की बड़ी वजह पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार किसी राष्ट्रीय मुद्दे की अनुपस्थिति है। सवाल है कि क्या आचार संहिता के कड़े अनुशासन में बंधे राजनीतिक दल और मीडिया मुद्दे उठा ही नहीं पाए या उन्होंने जानबूझ कर मुद्दे उठने ही नहीं दिए? या फिर क्षेत्रीय लोकतांत्रिक विखंडन से पस्त हमारी राजनीति अगली सरकार को लेकर जनता में उत्साह जगा ही नहीं सकी?

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