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संकट की राजनीति

पूरे अमेरिका में यह पूछा जा रहा है कि अमेरिकी वित्त बाजार को संकट से उबारने के लिए 700 अरब डॉलर का जो प्रस्ताव था, उसे प्रतिनिधि सभा ने गिरा क्यों दिया। उन्हीं राजनीतिज्ञों और दलों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट डाले जो कल तक कह रहे थे कि इस संकट का मुकाबला अमेरिका को वैसे ही मिलजुलकर करना चाहिए जसा कि उसने कैटरीना तूफान का किया था। अमेरिका के सामने सिर्फ संकट नहीं है, कुछ ही हफ्तों में होने वाला राष्ट्रपति का चुनाव भी है। इसलिए मुमकिन नहीं कि संकट और चुनाव दोनों एक-दूसर पर असर न डाले। चुनाव के समय की राजनीति और चुनाव के बाद की राजनीति में क्या फर्क होता है इसे भारत के लोग खूब समझते हैं। अमेरिकी मतदाता शायद इसे पहली बार इतनी शिद्दत से महसूस कर रहा है। बिल पेश होने से पहले राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक ओबामा और रिपब्लिकन उम्मीदवार मैककेन दोनों ने ही कहा था कि उन्हें इस बिल पर कई आपत्तियां हैं, लेकिन वे इसका समर्थन करंगे। जब बिल पेश हुआ तो समर्थन नदारद था हर जगह आपत्तियां ही आपत्तियां दिखीं। अखबारों ने लिखा कि आखिर प्रतिनिध सदन ने जनता की आवाज को सुना। संकट की शिकार अमेरिकी जनता बनी है, इसलिए उसमें ढेर सारा गुस्सा है। वह पूछ रही है कि सरकार ने जनता पर टैक्स थोप कर जो पैसा हासिल किया है उसे उन कंपनियों को संकट से उबारने में क्यों लगाया जा रहा है जिनकी गड़बड़ियों की वजह से ही यह संकट आया है? और अगर इन्हें संकट से उबार लिया जाएगा तो जिम्मेदार लोगों को सजा देने का काम कैसे होगा? सरकार की प्राथमिकता संकट से मुक्ित है। ताकि दुनिया को लगे कि हालात पर अमेरिकी सरकार का नियंत्रण है। लेकिन चुनाव के वक्त जनता के सवाल ही ऊपर रहते हैं सो वे ही छाए हुए हैं। समस्या का एक कारण शायद यह भी है कि अमेरिकी राजनीति जनता को यह समझाने में नाकाम रही है कि यह वित्त बाजार का नहीं अमेरिकी अर्थव्यवस्था का असल संकट है, जिससे न उबरने का अंतिम अर्थ है कि जनता को ही परशानी होगी। उम्मीद की किरण यही है कि तमाम वाद-विवाद के बाद बिल पास होना चाहिए इस बात पर राजनैतिक आम सहमति है।

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  • Web Title: संकट की राजनीति