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दो टूक

शब्दों के हृदयवेधी तीर चलाना कोई झारखंड के माननीयों से सीखे। कोई मुख्यमंत्री को रावण कह रहा है, तो कोई भरी विधानसभा में सारी मर्यादाएं लांघ रहा है। रावण तो उद्भट विद्वान था। उसकी कलुषित प्रवृत्तियों ने उसे रावण की संज्ञा दे डाली। पर कलियुग के लोकतंत्र में नेताओं के मुंह से उपहासकारी, अशोभनीय उद्बोधनों से ऐसा साबित होता है कि इनकी प्रवृत्तियां खुद ही रावण जसी हैं। जनता के प्रतिनिधि जब जनता की बनायी मजलिस को ही शर्मसार करने लगें, तो आस की कड़ी कहां जाकर जुड़ेगी। यह देश अपनी उदात्त संस्कृतियों के कारण जाना जाता है। कम से कम जनप्रतिनिधियों से इतनी अपेक्षा तो है ही कि वे वाणी पर संयम रखकर नेतृत्व का मॉडल प्रस्तुत करंगे। पावन नवरात्र में ही ऐसी प्रवृत्तियां शमित हो जायें, यह संकल्प हमें लेना चाहिए।

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