गांधीगिरी : सिक्िकम के लामाओं की नई राह - गांधीगिरी : सिक्िकम के लामाओं की नई राह DA Image
13 दिसंबर, 2019|9:39|IST

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गांधीगिरी : सिक्िकम के लामाओं की नई राह

लामाओं की धरती सिक्िकम के नौजवान आजकल गांधी से प्रेरणा ले रहे हैं, उस विकास के विरोध के लिए जो ऊपर से उन पर थोपा गया है। तीस्ता नदी का विरोध कर रहे कई युवकों की लगन को देखकर तो लगता है जसे साक्षात गांधी ही यहां आ गए हों। इसी साल 13 जून को ऐसे ही दो युवकों दावा लेपचा और तेंजिंग लेपचा ने सिल्क के कपड़े से लिपटी गांधी की तस्वीर के सामने अपना सत्याग्रह खत्म किया। इसके लिए उन्होंने पूर दिन की भूख हड़ताल की। इनके एक और साथी आंगचुक लेपचा ने 81 दिन तक भूख हड़ताल की थी। और यह भूख हड़ताल भी तब खत्म की गई जब सरकार ने आश्वासन दिया कि वह उत्तरी सिक्िकम के द्ज़ोंगू क्षेत्र में जलविद्युत परियोजना पर काम रोक रही है। लेकिन इसी के साथ उत्तरी सिक्िकम के चुंगथाम में मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने 1200 मेगावॉट की तीस्ता जलविद्युत परियोजना के तीसर चरण की आधारशिला रख दी। वहां अपने भाषण में उन्होंने यह भी कहा कि सरकार 300 मेगावॉट की विवादास्पद पनांग जल विद्युत परियोजना से पीछे नहीं हटेगी। अगले ही दिन आंदोलन के संयोजक स्टेन लेपचा ने प्रेस रिलीा जारी करके सरकार के फैसले की निंदा की और क्रमिक अनशन के फिर से शुरू करने की घोषणा भी कर दी। यह पहला मौका नहीं है जब ये लोग विकास की नीतियों में बदलाव के वास्ते सरकार पर दबाव बनाने के लिए सत्याग्रह का सहारा ले रहे हैं। उनका पहला अनशन 63 दिन तक चला था और सरकार के इस आश्वासन के बाद खत्म हुआ था कि परियोजना की समीक्षा एक स्वतंत्र समिति से कराई जाएगी। तब उनके बैनर पर लिखा था, ‘दोंगू का बांध हमारी लाशों पर बनेगा’। उनका संगठन एफेक्टेड सिटिान ऑफ तीस्ता पिछले साल से ही सक्रिय है। परियोजना के विरोध का फैसला मुख्यत: नैतिक, जातीय और धार्मिक संवेदनाओं की वजह से लिया गया। उसे इसे राजनैतिक रूप देने के लिए उन्हें गांधी ही एकमात्र विकल्प दिखाई दिए। उन्हें डर था कि अगर परियोजना लागू हुई तो उनकी संस्कृति नष्ट हो जाएगी। शुरुआत गंतोक, दार्जीलिंग, कलिंपांग आौर नई दिल्ली मे विरोध प्रदर्शनों और धरनों आदि से हुई। सिक्िकम के लेपचाओं के लिए नदियां सिर्फ जलधाराएं और प्राकृतिक संपदा भर ही नहीं हैं। वे उनकी ऐसी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत हैं जिनके आस-पास उनकी जिंदगी भी टिकी हुई है और धार्मिक आस्थाएं भी। सिक्िकम के लेपचा कंचनजंघा की पांच चोटियों के हिसाब से अपने-अपने क्षेत्र से जुड़े होते हैं। उनकी अपनी पवित्र नदियां है, अपने पवित्र जलाशय और अपनी पवित्र गुफाएं। एक क्षेत्र के लेपचा को दूसर क्षेत्र में स्थायी रूप से बसने या जमीन खरीदने की क्षाजत नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371एफ उन्हें उनकी यह पहचान बनाए रखने की क्षाजत देता है, क्योंकि सिक्िकम के भारत में विलय के बाद वे अल्पसंख्यक हो गए हैं। इस लिहाज से भी देखें तो द्जोंगू के रिार्व फॅारस्ट में ऐसी परियोजना लगाना जिसमें बाहर के लोग बसें या पर्यावरण को नुकसान पहुंचे किसी भी तरह से ठीक नहीं। सिक्िकम के लेपचाओं ने अपनी इन्हीं धार्मिक आस्थाओं और रीति रिवाजों को गांधी के अहिंसक सत्याग्रह से जोड॥कर सरकार को नैतिक चुनौती दी। उन्होंने इस बहाने सरकार को याद दिलाया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की आवाज को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसे लेकर पूर राज्य में जो बहस चली और जो आंदोलन हुआ उससे सिक्िकम में लोकतंत्र की जड़ें ही मजबूत हुईं। साथ ही गांधी के औजारों को आजमाने का एक नया आधार भी तैयार हुआ। लोकतंत्र की राजनीति के इस दौर में जब आखिर में जीत संख्याओं से ही होती है, लेपचा जानते हैं कि शायद वे इस तरह से नहीं जीत सकते हैं। इसके बावजूद उन्होंने काफी अच्छे ढंग से अपने लोगों को संगठित किया, पर्यावरण से जुड़े संगठनों की मदद ली और मामले को मजबूत ढंग से उठाया। अब उनके साथ देश भर के ढेर सार गैर सरकारी संगठन भी आ खड़े हुए हैं। इससे एक तो उनमें यह अहसास बना है कि वे अलग-थलग नहीं हैं और उनकी आवाज अनसुनी ही नहीं रह जाएगी। उन्हें कुछ अन्य जगहों से भी सहयोग मिला है। तीस्ता नदी बेसिन का लगभग सात साल तक अध्ययन कर वाले सेंटर फॉर इंटरडिस्पलनरी स्टडीÊा ऑफ माउंटेन एंड हिल एनवायरनमेंट के निदेशक प्रोफेसर एम. के. पंडित ने कहा है कि तीस्ता परियोजना के तीनों चरण किसी भी तरह से ठीक साबित नहीं होंगे। उनका कहना है कि ये चरण जिस क्षेत्र में हैं वह भूकंप की दृष्टि से ज्यादा आशंकाओं वाला क्षेत्र है। जाहिर है कि उनके तर्को से लेपचाओं के तरकस को कुछ और हथियार मिल गए हैं। सिक्िकम की यह गांधीगिरी अपनी अगली परीक्षा की तैयारी कर रही है। लेखिका दिल्ली के इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में समाजशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।ं

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  • Web Title: गांधीगिरी : सिक्िकम के लामाओं की नई राह