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अचाब उमंग से निकला है अबकि ईद का चाँद

फिÊााओं में नई रंगत के साथ ईद के चाँद ने दस्तक क्या दी, अल्लाह की हर मखलूक (उत्पत्ति) खुशी में डूब गई। नूर छा गया। फरिश्तों ने फूलों की बारिश की। तारों ने कसीदे (प्रशंसा गीत) कहे। रोÊोदारों के नूरानी चेहर खिल उठे। चारों तरफ खुशी ही खुशी। दुआ करने का दौर शुरू हो गया। बच्चे ,बूढे और नौावान सभी उमंग व उल्लास में शामिल हो गए। पर वहीं थोड़ी दूर रूमी गेट की बुरियों से झाँकते हुए चाँद को देखकर मशहूर शायर ‘नैयरोलालपुरी’ ने कुछ यूँ महसूस किया- .हिलाल-ए-ईद (ईद का चाँद) को देखा तो दिल बहुत चाहा, दुआ को हाथ उठाएँ मगर उठा न सके खुदा-ए-पाक हमें खुद पे शर्म आती है, बरोÊा-ए-ईद भी हम नफरतें मिटा न सकेआीब रंग में डूबा हुआ है ईद का दिन, कि बढ़ के भाई को भाई गले लगा न सके।ड्ढr उनका कलाम पूरी तरह माकूल बैठता है। दुआ के लिए उनके हाथ नहीं उठे और हो भी क्यों न, नफरत फैलाने वाले साल भर इन्सानियत पर हावी रहे। Êाुल्म, यादती व आंतक के बीच Êिांदगी कटी। अल्लाह की सवरेत्तम सृष्टि ‘इनसान’ Êिांदा आग के हवाले की गई। बम के धमाकों में इंसानीोिस्म चीथड़ों की तरह फटे। पूरा सामाािक ताना-बाना बिखर रहा। इसलिए वह दुखी हैं। हुज्जततुल इस्लाम, अयातुल्लाह सैयद हमीदुल हसन के मुताबिक किसी भी मÊाहब में नफरत कीोगह नहीं है। कुरआन-ए-माीद के सूरा: अलहाा में खुदा का ऐलान है कि ‘अगर अल्लाह बाÊा लोगों के Êाुल्म से बाÊा लोगों को दूर न करता,ोोोितने भी सिनेगाग (यहूदी धर्मस्थल) हैं, चर्च हैं,ोितनी तरह के मंदिर हैं,ोितनी मसिदें हैं वह सब तोड़ दीोातीं’। इससे साबित होता है कि इस्लाम अमनपसंद दीन है। ईद के दिन आगे बढ़कर दूसर को गले लगना ही इस्लाम की सच्ची पैरोकारी है। धर्मगुरुओं की बेबाकी पर नैयरोलालपुरी को ताकत मिली फिर उन्हें यही चाँद कुछ इस तरह दिखाई दिया-ड्ढr नई खुशी, नए सपनेोगा के दम लेगा, तमाम गम के अंधेरे मिटा के दम लेगाआब उमंग से निकला है अबकी ईद का चाँद मेरी Êामीन कोोन्नत बना के दम लेगा।

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  • Web Title: अचाब उमंग से निकला है अबकि ईद का चाँद