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कामयाब नायक

आप अगर भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को कोई बड़ी कामयाबी नहीं मानते हों तो आपके निष्कर्ष मनमोहन सिंह के बार में कुछ दूसरे भी हो सकते हैं। लेकिन हम फिलहाल इसे इस तरह से ही देख रहे हैं कि उन्होंने एक मंजिल तय की थी और तमाम बाधाओं के बावजूद उसे हासिल कर लिया। कुल जमा राजनैतिक कैरियर में मनमोहन सिंह की दो ही बड़ी उपलब्धियां हैं। वित्तमंत्री के तौर पर भारत को विकसित देशों के आर्थिक बहिष्कार से मुक्ित दिलाना, और फिर प्रधानमंत्री के तौर पर देश को अंतरराष्ट्रीय परमाणु बिरादरी के बहिष्कार से मुक्ित दिलाना। पहली उपलब्धि ने लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था को एक आर्थिक ताकत में बदल दिया था और दूसरी का तो अभी आगाज ही हुआ है। वैसे कोई चाहे तो इनके साथ महंगाई और आतंकवाद बढ़ जाने, गरीबी का खत्मा न होने जसे कई क्षेपक भी जोड़ सकता है पर इससे मुख्य कथावस्तु शायद ही कमजोर हो। ठीक इसी मोड़ पर यह सवाल फिर आया है कि अगले आम चुनाव के बाद अगर कांग्रेस फिर से सरकार बनाने की स्थिति में आती है तो प्रधानमंत्री पद की बागडोर किसके हवाले की जाएगी। यह सवाल उस समय उठा है जब इसे बेमतलब हो जाना चाहिए था। इसलिए भी कि पिछले साढ़े चार साल में यह केंद्र सरकार की अकेली सबसे बड़ी उपलब्धि है। और इसलिए भी कि खुद कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी इसे ऑन रिकॉर्ड कह चुकी हैं कि कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार भी मनमोहन सिंह ही होंगे। इस सवाल का प्रधानमंत्री ने जो जवाब दिया वह भी दिलचस्प है। उन्होंने इस संभावना से इनकार तो नहीं किया लेकिन साथ ही यह भी जोड़ दिया कि कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद के योग्य कई और लोग भी हैं। वे चाहे जिस भी हालात में प्रधानमंत्री बने हों, लेकिन फिलहाल वे पार्टी के उन सब लोगों से ज्यादा ऊंचाई पा चुके हैं जो प्रधानमंत्री बनने की इच्छा भी रखते हैं और शायद योग्यता भी। कांग्रेस के सामने और कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि उसके पास अकेले कामयाब नायक मनमोहन सिंह ही हैं।

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