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बदहाली का ककहरा और शिक्षा व्यवस्था

भारत के बड़े शहरों में लगातार बम विस्फोट हो रहे हैं। एसे में दिल दहला देने वाले इस तथ्य पर ध्यान देना जरूरी है कि 2004 के बाद आतंकवादी हमलों के मामले में इराक के बाद भारत दूसर नंबर पर है। साथ ही हम यह नहीं भूल सकते कि हर रो गरीबी के कारण लोग मर रहे हैं और उनमें बड़ी संख्या में बच्चे भी हैं। लोग इसलिए भी मार जा रहे हैं कि वे दूसर धर्म के हैं। लड़कियां और औरतें इसलिए मर रही हैं कि उन पर काम का तिहरा बोझ है और स्वास्थ्य केंद्रों तक उनकी पहुंच न के बराबर है। लगातार जिंदगी और मौत के बीच झूलते ये भारतीय शाश्वत सच हैं। एक अन्य कड़वा सच वह व्यवस्था है, जिसके चलते अमीर-गरीब के बीच असमानता बढ़ती जा रही है। इसी कारण उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गो को आरक्षण देने के नाम पर प्रदर्शन और मीडिया में गरमागरम बहस होती है। जबकि प्राथमिक शिक्षा की दयनीय स्थिति की अनदेखी होती है। अभी भी लाखों भारतीय बच्चे एसे स्कूलों में जाते हैं जहां न बिल्डिंग है, न किताबें और न ही अध्यापक। आरक्षण के मसले पर फिल्मकार उमेश अग्रवाल ने ‘डिवाइडिड कलर्स आफ ए नेशन’ नाम से एक वृत चित्र बनाने का साहस दिखाया है। पिछले माह दिल्ली में हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इसका प्रीमियर हुआ। शीघ्र ही यह फिल्म दूरदर्शन पर भी दिखाई जाएगी। सवाल यह नहीं है कि आरक्षण सही है या गलत, सवाल यह है कि इन वर्गो के ‘क्रीमी लेयर’ को क्या आरक्षण के लाभ का दावा करना चाहिए? इस बात को फिल्म में दिखाया गया है। फिल्म के सबसे असरदार अंश गांव के वे स्कूल हैं, जहां वह गए। फिल्मकार ने प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए सही जगह चोट की है। अगर कमजोर वर्ग प्रारम्भिक स्तर पर ही अच्छी शिक्षा से वंचित है तो उच्च स्तर पर सीटें आरक्षित करने से क्या लाभ? अग्रवाल ने फिल्म में राजस्थान में बाड़मेर के जिस स्कूल को दिखाया है, वहां पांच कक्षाओं के लिए मात्र दो शिक्षक हैं और इन्हीं में से एक प्रिंसीपल भी है। जिस दिन फिल्मकार स्कूल गया, उस दिन दोनों अध्यापक नदारद थे। स्कूल में 188 छात्रों में से मात्र 25 उपस्थित थे। पास ही के भील गांव स्थित सरकारी स्कूल की स्थिति भी अच्छी नहीं थी। वहां कक्षा एक से पांच तक के 0 छात्रों के लिए मात्र एक अध्यापक है। राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर एक अन्य स्कूल दोपहर 12.30 बजे वीरान पड़ा था। स्कूल में कोई बच्चा नहीं था और स्कूल का एकमात्र शिक्षक भी आठ दिन से लापता था। एसी स्थितियों को देखने के बाद इस तथ्य से कोई आश्चर्य नहीं होता कि राजस्थान में पिछले दस वर्षो में दसवीं कक्षा में 50 प्रतिशत बच्चे फेल हो रहे हैं। ये हालत तो देश के दूरदराज के गांवों की है, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के पास के सरकारी स्कूल की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। यहां 18 कक्षाओं में से नौ में कोई शिक्षक नहीं है और आधा सत्र बीत जाने पर भी बच्चों को पाठ्य पुस्तकें नहीं मिली हैं। भारत में लाखों गरीब बच्चों को एसे कठिन हालात में ही पढ़ना-लिखना सीखना पड़ता है। शिक्षा के अधिकार की गारंटी वाले कानून के लाख प्रचार के बावजूद कुछ नहीं हुआ। राज्य सरकारों ने प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य तो रखा, लेकिन स्कूलों की हालत में एसा कोई सुधार नहीं किया कि बच्चे वहां जाकर वास्तव में कुछ सीख पाते। ‘प्रथम’ नामक गैर सरकारी संगठन ने इन तथ्यों को बार-बार उाागर किया है। संगठन ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट ‘एनुअल स्टे्टस आफ एजुकेशन रिपोर्ट’(एएसईआर)में शिक्षा के अधिकार पर ध्यान आकर्षित किया है। वर्ष 2006 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण भारत में कक्षा एक के आधे बच्चे ककहरा नहीं पढ़ पाते तो कक्षा दो के आधे बच्चे शब्द नहीं पढ़ पाते। यहां तक कि तीसरी के आधे बच्चे पहली की और पांचवीं के आधे बच्चे दूसरी की पाठ्य पुस्तक नहीं पढ़ पाते। अखिल भारतीय स्तर पर तीसरी कक्षा के बमुश्किल 20 प्रतिशत बच्चे ही दूसरी कक्षा की पाठ्य पुस्तकें पढ़ पाते हैं। 15 राज्यों में तो यह प्रतिशत 20 से भी कम है। एएसईआर सव्रेक्षण इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि अधिकांश स्कूलों में बच्चों को जिस ढंग से पढ़ाया जा रहा है, वह स्वयं में समस्या है। अनुसंधानकर्ता सुमन भट्टाचार्य ने एएसईआर की ‘लरनिंग टू रीड’ श्रृंखला में चर्चा के दौरान साफ कहा कि हाल के वर्षो में शिक्षा व्यवस्था पर किया गया निवेश संसाधनों की बर्बादी है। जब तक यह सुनिश्चित न हो कि देश में प्राथमिक स्कूल के बच्चे पढ़ना सीख रहे हैं, खर्च किए जा रहे पैसे का सदुपयोग नहीं माना जा सकता। अगर स्कूल के पहले पांच साल में बच्चे थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना सीख पाते हैं तो इसका कारण वे गरीब माता-पिता हैं, जिन्हें कमाई के लिए अतिरिक्त हाथों की जरूरत है और वे अपने बच्चों को बीच में ही स्कूल से निकाल लेते हैं। जब शिक्षा प्राप्त करने की स्थितियां एसी हों तब बच्चे का स्कूल में दस साल पूर करना नामुमकिन है। एसी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अगर बच्चे अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो आगे बढ़ने के लिए निश्चित रूप से उन्हें आरक्षण या अन्य किसी तरह का प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत है। लेकिन प्रश्न यह है कि इस वर्ग के कितने बच्चे उच्च शिक्षा के उस मुकाम तक पहुंचते हैं, जहां वे दी जाने वाली विशेष सुविधाओं का उपयोग कर सकें? अग्रवाल की फिल्म में दिखाए गए गांव के स्कूलों के बच्चे इन स्थितियों में पढ़ने के बावजूद आशावादी हैं। उनकी आंखों में आशा और उम्मीद की किरण दिखाई देती है। सवाल उठता है कि जब हम परमाणु शस्त्रों व उरा, राजमार्गो व हवाई अड्डों, तेल क्षेत्रों व खनन, उद्योग और बाजार में भारी निवेश कर सकते हैं, तो क्या देश के बच्चों के लिए पर्याप्त स्कूल नहीं बनवा सकते? लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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