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कम उपजता है 11 लाख टन अनाज

झारखंड में बंपर फसल और किसानों की भलाई की बात सेकेंडरी है। पूंजीनिवेश की होड़ में खेतों में हरियाली और किसानों के चेहर पर चमक नहीं दिखती। आठ साल में किसी विजन पर काम नहीं हुआ। स्थिति थोड़ी सुधारी,पर आंकड़े अब भी सुखद नहीं। राज्य में आवश्यकता से 11 लाख टन अनाज कम उपजता है। आत्म निर्भरता के लिए 52.56 लाख टन खाद्यान्न चाहिए। 2007-08 में 41.25 लाख टन अनाज का उत्पादन हुआ। इस साल ना जाने क्या होगा, जब पलामू में खरीफ और भदई दोनों मारी गयी हैं। संथालपरगना के कुछ इलाकों में बाढ़ से फसलें बर्बाद हुई हैं। सत्ता संभालने के बाद कई मौके पर सीएम ने टिप्पणी की : पेट भरना है, तो खेत पर चलो। पर इस सोच को कौन कर साकार? सरकारी रिपोर्ट में पलामू में 75-80 प्रतिशत मकई की फसल बर्बाद हो गयी है। धान की खेती भी प्रभावित हुई है।पलामू में भयावहता का जायजा लेने के लिए मंत्रिमंडलीय उपसमिति का गठन हुआ है। अनाज उत्पादन के मामले में झारखंड पिछड़ा है और साल दर साल बीपीएल परिवारों की संख्या बढ़ रही है। यह संख्या 23 लाख पार हो गयी है। किसानों के लिए फसल बीमा योजना भी ठीक से लागू नहीं हो रही। सिंचाई की मुकम्मल व्यवस्था नहीं होने, पूंजी की कमी, घटिया खाद्य- बीज की आपूर्ति, किसान कार्ड बनाने में अनियमतिता जसे कारणों प्रमुख है। आठ वर्षो में सिंचाई विभाग ने 34 अरब 67 करोड़ का बजट बनाया। 22 अरब सात करोड़ खर्च हो गये। पर यह त्रासदी ही है कि 28 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि में 22 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मयस्सर नहीं। किसानों को 55300 स्मार्ट कार्ड तथा 30 हाार स्वायल हेल्थ कार्ड बांटने की योजना पर काम चल रहा है। ं

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