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दो टूक

सत्ता सुख भोगना और बात है, पर तंत्र को उंगलियों पर नचाने का उपक्रम गले नहीं उतरता। राज्य में विधायक, मंत्री और शीर्ष नेता सत्ता में आते ही अपने चहेते अफसरों को मलाईदार कुर्सियां दिलाने में परहेा नहीं करते। दबाव बनाते हैं, ताकि अपना हित साधन हो सके। कांग्रेस सांसद सुशीला केरकेट्टा ने अपने चहेते अफसरों और पुलिसकर्मियों की जो लिस्ट सरकार को थमायी है, उसका निहितार्थ भी यही है। जनता के साथ घात करने का यह सिलसिला नया नहीं है। सभी सरकारों में इसी प्रकार तंत्र को अपने अनुरूप बनाने की परंपरा रही है, ताकि असली मलाई पर खुद ही हाथ साफ करने का रास्ता निष्कंटक बना रहे। जब नेता ही जाति, धर्म और खेमे के आधार पर व्यवस्था को प्रभावित करने की सोच रखेंगे, तो आम आदमी से क्या उम्मीद की जा सकती है।

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