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बुरा मानो या भला : जबर्दस्ती से धर्म नहीं बदलता

हाल ही में ईसाइयों और उनकी चर्चों पर हमले हुए हैं। उनकी खुल कर निंदा होनी चाहिए। उससे भारत माता पर कलंक लगा है। हिन्दू दुनिया में सबसे ज्यादा सहनशील हैं। उस पर भी सवालिया निशान लगा है। अब दुनियाभर में जबर्दस्ती धर्म बदलाव कहीं नहीं होता। हिन्दुस्तान भी कोई अलग नहीं है। कहते हैं कि गरीब, अनपढ़ और सीधे-सादे लोगों को ईसाई बनाया जा रहा है। यह सरासर झूठ है। दरअसल, कुछ बेहद पढ़े-लिखे लोग ही अपना धर्म बदलते हैं, जब उन्हें अपने पुरखों के धर्म में शांति नहीं मिलती। अमेरिका और यूरोप में ऐसी मिसालें हैं, जहां लोग यहूदी धर्म, ईसाइयत वगैरह को छोड़ कर बौद्ध, हिन्दू, मुसलमान और सिख हुए हैं। कई लोग तो इसलिए धर्म छोड़ने को तैयार हुए, क्योंकि उन्हें शादी करनी थी। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और सिखों के बीच शादियों की तमाम मिसालें हैं। यों सबसे ज्यादा धर्म बदलाव उन लोगों में होते हैं, जो अपने समाज में ऊंच-नीच महसूस करते हैं। सबसे बड़ी मिसाल तो बाबा साहेब आंबेडकर की है। वे अपने महार समाज के साथ हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध हो गए, क्योंकि उच्च जाति के हिन्दुओं ने उनके साथ गैर बराबरी की थी। यही 0 फीसदी हिन्दुस्तानी मुसलमानों के साथ हैं। उन्होंने बराबरी पाने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया। माना जाता है कि इस्लाम ने तलवार की धार पर धर्म बदलाव कराया। इससे यह सोच ही गलत साबित हो जाती है। फिर बड़ी तादाद में लोग एहसान की वजह से भी दूसरा धर्म अपना लेते हैं। उनके साथ भी जम कर भेदभाव हुआ था। वे गरीब और उपेक्षित होते हैं। जब अजनबी उनके लिए स्कूल-कॉलेज और हॉस्पीटल खोलते हैं, उन्हें लिखना-पढ़ना और पैरों पर खड़ा होना सिखाते हैं, तो वे एहसान मानते हैं। अपना धर्म ही बदल लेते हैं। ईसाई मिशनरी इस तरह के काम खूब करते हैं। वे दूरदराज के इलाकों में काम करते हैं। नाउम्मीद लोगों में भी उम्मीद की किरण जगाते हैं। आज भी ईसाई मिशनरियों के स्कूल, कॉलेज और हॉस्पीटल बेहतरीन ढंग से चलते हैं। वे सस्ते हैं और भ्रष्टाचार से पर हैं। क्या उनकी वजह से धर्म बदलने वालों को जबर्दस्ती के खाते में डाला जा सकता है? आखिर हिन्दुत्व के चैंपियन क्यों नहीं अपने गिरहबान में झांकते? अपने दिल से क्यों नहीं पूछते कि उनके यहां इतनी गैर बराबरी क्यों हैं? वे क्यों नहीं अपने धर्म में रहना चाहते? उन्हें सबसे पहले अपना घर ठीक करना चाहिए। हिन्दू समाज से जाति की बुराई को उठा फेंकना चाहिए। उन तमाम लोगों का स्वागत करना चाहिए जो उनके धर्म को अपनाना चाहते हैं। तब शायद कोई भी हिन्दू धर्म को छोड़ कर नहीं जाएगा। मानुची और पान वेनिस के निकोलो मानुची 14 साल के थे, जब हिन्दुस्तान आए। वह 1655 में आए तो यहीं बस गए। वह दिल्ली, आगरा और गोवा में रहे। डॉक्टरी करते रहे और बाद में पांडिचेरी में उनका आखिरी वक्त बीता। 1717 में वह चल बसे। उनकी ‘स्टोरिया ऑफ मोगोल’ में मुगल बादशाहों के हरम पर तमाम मजेदार किस्से हैं। अपने हिन्दुस्तान के पहले सफर में वह सूरत से आगरा और दिल्ली तक आए थे। यहां उन्होंने हिन्दुस्तानियों की खास चीज को देखा। उन्होंने लिखा, ‘और तमाम चीजों के अलावा मैं हैरत में था कि तकरीबन सभी लोग खून जसी लाल चीज थूक रहे हैं। मैंने सोचा कि यह किसी दिक्कत की वजह से होगा या उनके दांत टूट गए होंगे। र्मैंने एक अंग्रेज लेडी से पूछा, ‘यह क्या है? क्या दांत उखाड़ने की कोई परंपरा है?’ उसने कहा कि यह कोई बीमारी नहीं है। यह तो पान है। पुर्तगाली में उसे बीटल कहते हैं। उसने पान का पत्ता मंगाया। खुद खा लिया। एक मुझे भी दे दिया। मेरा तो सिर चकरा गया। मुझे लगा कि बस मर ही जाऊंगा। मैं गिर पड़ा। मेर चेहर की रंगत उड़ गई। उसने मेर मुंह में थोड़ा नमक डाला। तब मुझे कुछ होश आया। उस लेडी ने बताया कि जो भी उसे पहली बार खाता है, ऐसा ही महसूस करता है।’ ‘पान का पत्ता इलाज के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। उसमें चूना और कत्था लगा कर तकरीबन हर हिन्दुस्तानी खाता है। उससे होंठ लाल हो जाते हैं। और मुंह से खुश्बू आती है। अब जो तंबाकू के साथ खाते हैं, वे दिन में कई बार लेते हैं। वे बहुत देर तक उसके बिना नहीं रह सकते। यहां पर लोग अपने मेहमानों को पान पेश करते हैं। उसे स्वीकार न करना अच्छा नहीं माना जाता।’ पान का यह किस्सा रैंडम हाउस से एम. एच. फिशर के संपादन में आई किताब ‘फ्रॉम बेयॉन्ड द थ्री सीज’ में है।

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