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चुनावी घोषणाएं

चुनावी मौसम में जसी घोषणाएं होती हैं केन्द्र सरकार ने उनके अनुकूल ही फैसले लिए। आरक्षण के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) की आय सीमा में क्षाफा कर दिया गया, मदरसों में शिक्षा स्तर सुधारने के नाम पर करोड़ों रुपए बांटने का ऐलान हुआ, रेल कर्मचारियों को बोनस देने की घोषणा की गई, खफा सेना को खुश करने के लिए तरक्की के फामरूले को मंजूरी मिल गई तथा एक दर्जन नए केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलने का संकल्प किया गया। इनमें से किसी फैसले के खिलाफ कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि सभी निर्णय उचित हैं। बात केवल घोषणाओं के समय पर अटक जाती है क्योंकि हिन्दी पट्टी के कुछ महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनावों के चलते जनहित के मुद्दे वोट की राजनीति से गड्ड-मड्ड हो गए हैं। केन्द्रीय शिक्षा संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण देने के बावजूद इस वर्ग से योग्य छात्र न मिलने से इस वर्ष काफी सीटें खाली रह गई थीं, जिन्हें अदालत के आदेश के कारण सामान्य श्रेणी को दे दिया गया। छठे वेतन आयोग की सिफारिश लागू हो जाने तथा 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रही महंगाई के बाद ओबीसी की क्रीमी लेयर की सीमा में वृद्धि उचित ही है। आशा है अगले वर्ष पिछड़े वर्ग की सीटें खाली रहने की नौबत नहीं आएगी। मदरसों में शिक्षा का स्तर सुधारने की भी सख्त जरूरत है। वहां पाठ्यक्रम में विज्ञान, गणित, अंग्रेजी और समाज विज्ञान के विषय जोड़ने से अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों को नौकरी पाने में आसानी रहेगी। यह काम काफी पहले होना चाहिए था। सेना में पदोन्नति पर अजय विक्रम सिंह समिति के दूसर चरण को लागू करने में तो काफी देरी की गई है। सबसे दिलचस्प फैसला नए केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलने का है। देश में उच्च शिक्षा के विस्तार की आवश्यकता से कोई इनकार नहीं कर सकता, किन्तु क्या यह काम सरकार अकेले अपने बूते कर सकती है? योग्य शिक्षकों की कमी के कारण मौजूदा संस्थानों और विश्वविद्यालयों को सुचारू ढंग से चलाना कठिन होता जा रहा है। वैसे भी सरकार का प्रथम दायित्व प्राथमिक शिक्षा को सुधारना और सर्वशिक्षा अभियान को सफल बनाना है। धन और साधनों की कमी के कारण आज भी करोड़ों बच्चों को स्कूल देखना नसीब नहीं हो पाता। अच्छा हो पहले प्राथमिक शिक्षा के मोर्चे पर ध्यान दिया जाए ।

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